Friday, 28 May 2021

बागेश्वर एवं पिथौरागढ़ जिलास्तर संगोष्ठी



आज दिनांक 24/04/2021 मध्यान एक बजे बागेश्वर एवं पिथौरागढ़ की संगोष्ठी सम्पन्न हुई। संगोष्ठी की अध्यक्षता संगठन के कार्यकारिणी सदस्य डॉ. नवीन पाण्डेय जी कर रहे थे। संगोष्ठी का संचालन बागेश्वर एवं पिथौरागढ़ जिला संयोजक श्री गौरव जोशी जी कर रहे थे। 

दोनो जिलास्तर की आज पहली संगोष्ठी हुई, जिसमें जिला संयोजक गौरव जोशी जी ने ग्रामीण स्तर की मूलभूत सुविधा जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं पलायन को मुख्य बिन्दु बनाया जिस पर सभी कार्यकर्ताओं ने अपने विचार रख कर उनको धरातल पर लाने की बात कही। गौरव जी ने गढ़कुमाऊँ संगठन के बारे में बताते हुए कहा है कि, इसकी मूलभूत आवश्यकता व्यक्तित्व विकास एवं उत्तराखण्ड के विकास के लिए किस प्रकार से पीड़ा हमारे मन में होनी चाहिए हमें भली भांति समझना होगा।  

संगठन में बागेश्वर जिले से प्रतिभाग कर रहे प्रथम वक्ता श्री रविन्द्र कुमार जी ने बताया है कि लोग अच्छी शिक्षा, उत्तम स्वास्थ्य तथा अच्छे रोजगार के लिए पलायन करते हैं, लेकिन दुर्भाग्य यह बन जाता है कि वो वापस गांव आने की इच्छा नही रखते जिससे कि उनके घर धीरे-धीरे बन्जर पड़ जाते हैं। जो घर एक बार बन्जर पड़ गया तो उसको सुधारना बहुत ही कठिन कार्य हो जाता है। उत्तराखण्ड में शिक्षा के स्तर को सुधारने बल देना चाहिए। शिक्षा ऐसी हो जो उत्तराखण्ड के लिए रोजगारोन्मुख हो।

संगठन में रामगढ़ नैनीताल से पधारे मुकुल जी का कहना है कि जो व्यक्ति अभी कोरोना महामारी के दौरान अपने उत्तराखण्ड में वापस आए हैं उनके लिए सरकार की तरफ से बहुत योजनाएं हैं जो ब्लॉक स्तर पर मिलती है जैंसे कृषि यन्त्रों को खरीदना, पर्यटन के लिए छोटे स्तर पर होटल इत्यादि खोलना एवं फल-सब्जियां उगाना इत्यादि। 

डीडीहाट विधानसभा प्रतिनिधि श्री दीपक जी ने कहा कि उनके गांव क्षेत्र में अभी तक सड़क, शिक्षा एवं स्वस्थ्य की उचित व्यवस्था नहीं है। क्षेत्र में पर्यटन के लिए अच्छा कार्य हो सकता है।  जैसे यहाँ पर घाटियां हैं दारमा, चौदास, व्यास घाटी, मुन्स्यारी एवं द्वापरयुग के बहुत से पुराने मन्दिर हैं जो दुर्गम क्षेत्र होने के कारण आजतक मुख्यधारा में नहीं जुड़ पाए हैं। यहां पर इक्कीस नागों के मन्दिर हैं। शिराकोटी मुख्य मन्दिर है। प्राचीन मन्दिर एवं धरोहरों का जीर्णोद्धार करके वहां पर सैलानियों को आमन्त्रित करके स्थानीय लोंगो को रोजगार प्राप्त हो सकते हैं।

पिथौरागढ़ से पधारे धीरेन्द्र जी ने बताया है कि यदि जो व्यक्ति उत्तराखण्ड में किसी भी क्षेत्र में जैंसे शिक्षा, स्वास्थ्य एवं खेलकूद से जुड़ा हो वह गांव-गांव में अपनी प्रतिभा से युवाओं को उस मार्ग की ओर प्रेरित कर सकते हैं जिससे कि उत्तराखण्ड के युवाओं का भविष्य एक बेहतर दिशा की ओर उन्मुख हो सके। हमें अपनी मातृभूमि पर गर्व होना चाहिए इस से हमारा लगाव कम नहीं होना चाहिए।

बागेश्वर से श्री सीताराम जोशी जी ने मातृ भाषा को बढ़ावा देने के लिए कहा और सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए कहा कि हम जो भी संगोष्ठी करेंगे या जब भी एक दूसरे से मिलेंगे तो अपनी मातृभाषा में वार्तालाप करेंगे। जिससे हमारी भाषा की रक्षा एवं संवर्धन हो सके।

पिथौरागढ़ से हरीश कार्की जी ने अवैध नशा जैंसे गांव देहातों में शराब बनाई जा रही है जिससे कि कम उम्र के लोगों की मौत की तादाद बढ़ी है। इन अवैध शराब-खानों पर तब ही नकेल कसी जा सकती है  जब-तक हम संगठित नहीं होंगे क्योंकि इनके खिलाफ अकेले कोई आवाज नहीं उठा सकता। 

बागेश्वर से गोपेश जी नें उन सभी आंदोलनकारियों का स्मरण किया। उन्होने निर्मल पण्डित एवं श्रीदेव सुमन जी को वाचा पुष्पांजलि देते हुए कहा है कि हमें इन पुण्यात्माओं के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। जब-तक पहाड़ के व्यक्ति को पहाड़ के प्रति पीड़ा नही होगी तब-तक हम पहाड़ के लिए समर्पित नही हो सकते हैं। हमारे हितों के लिए जो भी आवाज उठाते हैं हम उसको बहुत जल्दी उसको भूल जाते हैं। हमें याद रखना होगा उन सभी के व्यक्तित्व को जिन्होंने पहाड़ी राज्य के लिए आजीवन संघर्ष करके अपने प्राणों की आहुति दे दी। जो व्यक्ति हमारी भावनाओं के विरुद्ध कार्य करता है हम उसके कुकृत्य को भी यथाशीघ्र भूल जाते हैं। आज से कुछ दशक पहले की शिक्षा में समानता थी सभी वर्ग के बच्चे सरकारी स्कूल में एक साथ पढ़ते थे परन्तु आज स्थिति जगजाहिर है। हमें सरकारी स्कूलों की तरफ ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। उत्तराखण्ड में जितने भी गरीब परिवार रह रहे हैं जिनके पास ऑनलाइन कक्षा लेने के लिए एन्ड्रोइड मोबाइल नहीं है उन बच्चों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। निजिकरण को रोकना ही हमारा प्रथम लक्ष्य होना चाहिए।

गोपेश जी ने सरकारी नीतियों को आड़े हाथों लेकर कहा है कि गढ़वाल का विकास देहरादून एवं कुमाऊँ का विकास हल्द्वानी। उत्तराखण्ड का मूल विकास वहां के गांव से जुड़ा है। देवस्थानों में  पवित्रता का ध्यान में रख कर देव दर्शन करें।

अध्यक्षीय सुझाव में डॉ. नवीन पाण्डेय जी ने संगठन में कार्यकर्ता निर्माण पर बल देते हुए कहा है कि उत्तराखण्ड में जितनी भी मूलभूत समस्याएं हैं उन सभी का कारण यह है कि हम अपना अधिकार छीनना भूल गये हैं हमें आदत पड़ गई कि कोई हमें हमारे हाथों में दे कर चला जाए हम उस ही में खुश रहते हैं। इसलिए अब हमें जागना होगा और सभी उत्तराखंड वासियों को जगाना होगा। आज उत्तराखण्ड को स्वराज्य का दर्जा प्राप्त हुए 21 वर्ष हो गये लेकिन स्थिति आप सभी के समक्ष है। कल जब हमारी पीढ़ी हमसे ये कहे कि आप जब समर्थवान थे तो हमने अपने उत्तराखण्ड के सुन्दर भविष्य   के लिए कुछ क्यों नहीं किया? इसलिए सभी साथियों को संगठित करना होगा जिससे कि सशक्त उत्तराखण्ड का विकास हो सके यहां के लोगो को उनकी मूलभूत सुविधाओं से वंचित न रखा जाए। 

कार्यकर्ता और संवाददाता दीपक सिंह बोरा डीडीहाट

Wednesday, 26 May 2021

उत्तराखंड के बावन गढ़ों में एक, काण्डारागढ़ से जुड़ी कुछ रोचक बातें



अम्बा मोहित देवता त्रिभुवनी आनन्दसंदायिनी।

वेणु पल्लव वाणि वेणु मुरली ज्ञानं प्रियं प्रियं लोचनं।।

सावर्णिउदराज बिम्बवदनं धुम्राक्ष संहारिणीम्।

श्चिदरूपा पर देवता भगवती श्री राजराजेश्वरी।।


उत्तराखण्ड भारतवर्ष के उत्तर दिशा में स्थित है। उत्तराखण्ड जिसका पौराणिक नाम मानसखण्ड भी है । हिमालय की गोद में स्थित, देवताओं की पुण्य भूमि तथा ऋषि-मुनियों की तपस्थली रह चुका यह क्षेत्र अपने आप में साक्षात् देवत्व  सिद्ध किया हुआ है।


कण्डारागढ़ रुद्रप्रयाग जिले के सबसे बड़े गांव में से एक


उत्तराखण्ड के बावन गढ़ों में से एक कण्डारागढ़ रूद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि ब्लॉक में स्थित है। लगभग 400-500 वर्ष पूर्व राजा नरवीर कण्डारी ने यहाँ पर शासन किया था। आज भी उस काल की गुफाएँ, मूर्तियाँ, ताम्रपत्र आदि प्राप्त होते है।

प्रकृति ने इस गाँव को अद्बुत रूप से अपनी गोद में सुशोभित किया है। उत्तराखण्ड के रूद्रप्रयाग जिले में सबसे बड़े गाँव में इस गाँव को द्वितीय स्थान प्राप्त है। इस गाँव में लगभग 700 परिवार निवास करते हैं तथा लगभग 1800 मतदाता हैं। वर्तमान में यहाँ की जनसंख्या लगभग  6,500 है। कण्डारा गाँव की ईष्ट देवी माँ भगवती राजराजेश्वरी है जो कि सम्पूर्ण क्षेत्र की भी कुलदेवी है। यह एक विकासशील गाँव है। विकास की दृष्टि से सभी क्षेत्रों में सम्पन्न एवं परिपूर्ण है।


कण्डारा ग्राम के पूर्व में प्राचीन शिव मन्दिर रंगेश्वर महादेव पश्चिम में नगाधिराज पर्वत हिमालय उत्तर में वीर भैरवनाथ मन्दिर दक्षिण में क्रौंच पर्वत  तथा भगवान कार्तिक का मन्दिर स्थित है।


साक्षरता में भी आगे


साक्षरता की दृष्टि से भी यह गाँव अति उत्तम है। वर्तमान में यहाँ की साक्षरता लगभग 90प्रतिशत है। यहाँ के लोग समाज के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अच्छे-अच्छे पदों पर विराजमान हैं। जैंसे श्री राकेश चन्द्र गैरोला पूर्व उपशिक्षा निदेशक झाँसी मण्डल (उत्तरप्रदेश सरकार), प्रो. प्रताप जंगवाण( प्राचार्य विद्यापीठ गुप्तकाशी), स्व. महेशानन्द गैरोला- जिला विद्यालय रुद्रप्रयाग में निरीक्षक (A.D.बेसिक) एवं मयंक रावत (परमाणु वैज्ञानिक इन्दिरागाँधी परमाणु अनुसन्धान केन्द्र) इत्यादि।


पाण्डव नृत्य और रामलीला के लिए विख्यात


कण्डारा ग्राम में बारह जातियाँ निवास करती है। सभी लोग उदार हृदयी तथा वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से रहते हैं। यहाँ का पाण्डव नृत्य एवं  रामलीला बहुत ही प्रसिद्ध है। यहाँ के रामलीला एवं पाण्डव नृत्य के पात्र देश के अनेक राज्यों में अपनी कला प्रस्तुत कर चुके हैं जिसमें उन्होनें अनेकों उपलब्धियाँ हासिल की है।


यहाँ पर प्रत्येक तीन अथवा पाँच वर्षों के अन्तराल में कुल देवी भगवती माँ राजराजेश्वरी का ढोल-दमऊ के साथ मण्डाण लगाया जाता है। माँ भगवती राजराजेश्वरी कण्डारा गाँव के सभी ग्रामवासियों के घर-घर जाती हैं तथा पूरे परिवार का कुशलक्षेम पूछकर उन्हे अपना आशीर्वाद प्रदान करती हैं। इस समय यहाँ दूर-दराज के अन्य क्षेत्रों के श्रद्धालुगण आकर माँ भगवती राजराजेश्वरी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।


धन्यवाद।।

आचार्य सुमित गैरोला जिला प्रमुख

उत्तराखण्ड गढ़कुमाऊँ क्षेत्रीय संगठन

 

Tuesday, 25 May 2021

उत्तराखंड में गांवों से अधिक NGO फिर भी विकास को नहीं मिल रही गति, क्यों?



ये शब्द सभी ने सुना होगा? यदि हम बात करें कि ये NGO होता क्या है? तो सबके मन में यही प्रश्न आता है कि ये कोई संस्था है जो सामाजिक उत्थान के लिए कार्य करती है। 

चलो आज आपको NGO का सही अर्थ बताते हैं-

NGO का अंग्रेजी अर्थ होता है- 

N- NON नॉन, G- GOVERNMENT गॉवरमेन्ट, O- ORGANIZATION ऑर्गनाइजेशन अर्थात् बिना सरकार की सहायता से चलने वाला संगठन।

NGO को हम तीन वर्ग में विभाजित करते हैं-

  1. Trust Act

  2.  Society Act

  3. Companies Act

यह संगठन विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक कार्य करते हैं। वह कार्य इस प्रकार से है-  समाज में किसी भी प्रकार की सहायता जैसे विधवा महिलाओं के लिए आवास की व्यवस्था, गरीब अनाथ बच्चों को पढ़ाना, महिलाओं की सुरक्षा, जलाशयों को सुरक्षित रखना, बीमारी के रोकथाम के लिए कार्य करना गौ-पालन एवं शहरी व ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए NGO कार्य करती है।

अब आप समझ चुके होंगे कि NGO का मतलब होता क्या है। और वर्तमान में इन NGO की उत्तराखण्ड में क्या भूमिका है?

सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में 16,674 गाँव है और गैर-सरकारी संगठन मतलब  NGO की संख्या 51,765 का आंकड़ा अभी तक पंजीकृत हो चुका है, यह आंकड़ा बहुत ही चौंकाने वाला है, लेकिन यह सतप्रतिशत सत्य है। अब आप खुद से गणित करोगे तो पाओगे कि औसतन प्रत्येक ग्रामसभा में तीन-चार एनजीओ कार्य कर रहे हैं। इनमें भी 60 प्रतिशत से अधिक का कार्यक्षेत्र ग्रामीण विकास पर केन्द्रित है, जिनको केवल ग्राम सभाओं पर ध्यान देना है जैंसे स्कूली शिक्षा को बढ़ाना, छोटे-छोटे लघु उद्योग या कुटीर उद्योगों को खोलना, पौराणिक जल स्रोतो को सुव्यवस्थित करना इत्यादि। यदि हम एक आंकड़े की माने तो अब तक प्रत्येक गाँव की दिशा और दशा बदल गई होगी? मगर साथियों वास्तव में सच्चाई किसी से छिपी नही है और आज भी पहाड़ों की दुर्दशा, पहाड़ों में सुविधा का अभाव देखने को मिलता है,  विशेष रूप से गाँव-कस्बों से पलायन होता युवा वर्ग थम नही रहा है।

उत्तराखण्ड में एनजीओ के सैलाब ने एक उद्योग का आकार ले लिया है। केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें तक इन एनजीओ को खूब बजट दे रही हैं। ग्राम्य विकास, पर्यावरण, महिला उत्थान, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार, स्थानीय संसाधनो का बेहतर उपयोग समेत तमाम अहम मसलों पर जो कार्य सरकारी महकमें कर सकते थे, वो सभी कार्य आज इन एनजीओ के माध्यम से किये जा रहे हैं ताकि कुछ अच्छा परिणाम सामने आए। परन्तु सच में किस प्रकार से धरातल पर कोई कार्य एनजीओ द्वारा किया गया हो तो वह उंगलियों में गिनने लायक ही खरे उतरे हैं।

इस प्रकार की दुर्दशा ने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि औसतन तीन एनजीओ यदि उत्तराखण्ड के एक-एक गाँव पर कार्य को केन्द्रित करते तो कब की गाँवों की दिशा और दशा बदल चुकी होती। खैर अब आगे देखते हैं कि, शासन किस प्रकार से इन सभी पर नकेल कसती है परन्तु इस प्रश्न का उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है।

एक नजर डालते हैं कहाँ पर कितने एनजीओ सक्रिय हैं

जिला एनजीओ की संख्या

देहरादून 12,163

पौड़ी 6,187

हरिद्वार 6,053

अल्मोड़ा 5,026

टिहरी 4,841

ऊधमसिंहनगर 4,202

चमोली 3,297

पिथौरागढ़ 2,943

उत्तरकाशी 2,087

नैनीताल 1,942

रुद्रप्रयाग 1,359

चंपावत 904

बागेश्वर 671

अब आप स्वयं से या आस-पास से जरूर पता कर लें कि कौन सा एनजीओ हमारे आस-पास कार्य कर रहा है जिसकी हमें खबर तक नही लग पाई।

धन्यवाद।।


Monday, 24 May 2021

भारत की बेटी और उत्तराखंड की शान, पति के शहीद होने के बाद पहनेंगी सेना की वर्दी



 'यत्र नार्यस्तू पुज्यते' हमारे पुराणों में लिखे यह शब्द दर्शाते हैं कि भारत की इस धरती पर नारी का कितना सम्मान है। नारियों को जितना भी सम्मान दिया जाए वह कम है। नारी ही इस सृष्टि में जीवन दायनी है। लेकिन केवल जीवन दायनी ही नहीं रक्षक भी। 


जी हां, नारी एक रक्षक भी हैं। इसी का एक उदाहरण पेश किया है पुलावामा हमले में शहीद हुए मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल की पत्नि निकिता देवी जी। उनके पति 2019 में पुलवामा हमले में देश की रक्षा करते हुए और दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हुए थे। उनकी शहादत को चार चांद लगाने के लिए उनकी पत्नी ने आंसू बहाने की बजाय उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए देश की रक्षा का जिम्मा उठाया है। यह भारत की बेटी और उत्तराखंड की शान हैं और इस माह यानि मई महीने के 29 तारीख को भारतीय सेना की वर्दी पहनने जा रही हैं। 


ऐसे ही जज्बे की उम्मीद हर भारतीय से की जाती है। हम उत्तराखंडी लोग उत्तराखंड की शान निकिता देवी जी से बहुत कुछ सीख सकते हैं। अपने हौसले को तोड़ने की बजाय उसे एक नया आयाम देकर हम देश और इस समाज की रक्षा करना उनसे सीख सकते हैं। जो लोग बेटियों को लेकर अभी भी गलत विचार धारा लेकर जीते हैं उन्हें निकिता जी के सराहनीय कदम से सीखने की जरूरत है। 

शिक्षा- पहाड़ का सीना चीरकर धरती को स्वर्ग बनाने वाले, उत्तराखंड के इस सपूत से कुछ सीखें

 


दृढ़-निश्चयी माधो सिंह भंडारी उर्फ माधो सिंह मलेथा की कहानी हर उत्तराखंडी को पता होनी चाहिए। क्योंकि यह उस शौर्य, वीरता, बलिदान की कहानी है जिसने मातृभूमि के लिए अपने स्वार्थ से ऊपर उठाकर सोचने की सीख दी। 

400 साल से भी पहले हुआ था जन्म


माधो सिंह भंडारी का जन्म लगभग 1595 के आसपास बताया जाता है। उत्तराखंड के टिहरी जिले के मलेथा गांव में इन्होंने जन्म लिया था। बचपन से ही भंडारी जी बुद्धिमान और वीर थे, इसीलिए कम उम्र में ही गढ़वाल नरेश की सेना में वह सैनिक बन गए थे। लेकिन इनकी बुद्धिमानी और वीरता से ज्यादा इनके त्याग और अपनी भूमि के प्रति बलिदान की भावना को सबसे ऊपर रखा जाए तो गलत नहीं होगा। भंडारी जी एक बार जब अवकाश के दौरान अपने गांव मलेथा आए तो उन्होंने देखा कि गांव के खेत पानी की कमी के कारण सूखे पड़े हैं। उनके मन में लगातार यह बात चलने लगी कि आखिर अपनी धरती माता को हरा भरा बनाने के लिए पानी कहां से लाया जाए। फिर उनके मन में ख्याल आया कि गांव से कुछ दूर चन्द्रभागा नदी बहती है। उसका पानी गांव में लाया जा सकता है। हालांकि गांव के लोगों को यह बात जमी नहीं उन्होंने इसे असंभव कार्य बताया, क्योंकि नदी और गांव के मध्य बड़े पहाड़ और चट्टानें थीं। लेकिन माधा सिंह भंडारी जी ने ठान लिया था कि, इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है। 

भंडारी जी ने पहाड़ का सीना चीरकर सुरंग बनाने की बात मन में बिठा ली। आप सब जानते हैं कि तब इतने आधुनिक औजर भी नहीं थे कि इस काम को आसानी से संभव किया जाता। आज भी यदि हम पहाड़ को काटने की बात करें तो लोग हंसी ही ज्यादा उड़ाएंगे। हालांकि माधो सिंह भंडारी जी पर लोगों की बात का कोई असर नहीं पड़ा उन्होंने अकेले ही सुरंग खोदने का काम शुरू कर दिया। इसके बाद धीरे-धीरे लोग उनके साथ जुड़ने लगे और अंत में जीत उनकी हुई और लंबे संघर्ष के बाद सुरंग बनकर तैयार हो गयी। 



बलिदान के अद्वितीय गाथा

इसके बाद सबसे बड़ी समस्या आयी पानी को सुरंग के रास्ते गांव की भूमि तक लाने में। कई प्रयासों के बाद भी सुरंग में पानी नहीं आ पा रहा था। लोक कथाओं के अनुसार एक दिन माधो सिंह जी के सपने में उनकी कुलदेवी आयीं और कहा कि, नदी का पानी तब ही सुरंग के रास्ते गांव तक पहुंचेगा जब वह अपने एकमात्र पुत्र की बलि देंगे। यह बात सुनकर ही माधो सिंह विचलित हो गए। हालांकि उनके पुत्र गजे सिंह ने कहा कि आप मेरी बलि दे दें। आखिर में माधो सिंह ने अपनी धरती मां को हराभरा बनाने के लिए अपने एकमात्र पुत्र की बलि दे दी। इसके बाद नदी का पानी गांव के खेतों में पहुंच गया। आज भी माधो सिंह को मलेथा गांव के लोग भगवान की तरह पूजते हैं। ऐसा होना भी चाहिए। उनके इस बलिदान से आज पूरा मलेथा गांव हरा भरा है।  

आज भी इस सुरंग के पानी से मलेथा गांव के 110 एकड़ में फैले खेतों की सिंचाई होती है। इस पानी की ही बदौलत 275 परिवार खुशहाली से जीवन बिताते हैं। कहा जाता है कि आज तक पानी को लेकर इस गांव में कोई विवाद नहीं हुआ।



अब हर उत्तराखंडी को जागने की जरूरत है


यह कहानी हम पहाड़ियों को यह सीख देती है कि, हम पहाड़ का सीना चीरने की हिम्मत भी रखते हैं। हम सबको मिलकर अब अपना भाग्य खुद बनाना होगा। तेरा-मेरा, अपना-पराया के फेर में फंसकर हमारे उत्तराखंड का नाश होगा और कुछ नहीं। अपने स्वार्थों को भूलाकर हमको भी सबसे पहले अपने राज्य की चिंता करनी होगी। कहते हैं कि, गांव में पानी पहुंचाकर माधो सिंह भंडारी वापस कभी अपने गांव नहीं लौटे थे। कारण उनके एकमात्र पुत्र की बलि उनके द्वारा चढ़ाया जाना हो सकता है, पुत्र की यादों से दूर रहने के लिए शायद उसके बाद वो कभी न लौटे हों। लेकिन वह अपनी धरती को वह सबकुछ देकर गए जिसकी उनकी धरती को जरूरत थी। आज उत्तराखंड के लोग कहते हैं कि, इस धरती पर कुछ नहीं है वास्तव में सच्चाई यह है कि इस धरती में सबकुछ है हम ही पंगु बने बैठे हैं। जनचेतना को जगाने के लिए अपने नफे-नुकसान से ऊपर सोचना जिस दिन हम सीख जाएंगे उस दिन यह देवभूमि सही मायनों में देवभूमि बन जाएगी।  

प्राकृतिक आपदा: धारी गाँव में फटा बादल

 


उत्तराखण्ड टिहरी गढ़वाल में देवप्रयाग विधानसभा के कीर्तिनगर ब्लॉक के धारीदेवी ग्राम में दिनांक 23/05/2021 को सायंकाल 6:00 बजे अतिवृष्टि के चलते बगेढ़ नामक प्राचीन जल स्रोत के पास बादल फटा। जिससे कि पूरे गांव में एक मात्र जल स्रोत भी क्षतिग्रस्त हो गया है। रास्तों में जितनी भी पाइप लाइन बिछी हुई थी सब ध्वस्त हो चुकी है। गाँव के मध्य में सीमेंट की पांच हजार लीटर की टंकी अथवा प्लास्टिक की दस हजार लीटर की टंकी बह गयी है। जल का धारा पूरी तरह से समाप्त हो गया है जिससे ग्रामीणों के लिए आने वाले दिनो में पीने के पानी को लेकर संकट खड़ा होने वाला है। अब प्रशासन को यथाशीघ्र कोई ठोस कदम उठाकर ग्रामीणों की जल व्यवस्था को सुचारू रूप से व्यवस्थित करना चाहिए।

क्षतिग्रस्त जल स्रोत


ग्राम प्रधान धारी श्री सोहन प्रसाद पाण्डेय जी का कहना है कि सायं काल को जब प्रकृति ने रौद्र रूप धारण किया तब इस घटना से किसी भी प्रकार की जान-माल की हानि तो नही हुई है। किन्तु गाँव में जल के स्रोत पूरी तरह से नष्ट हो चुके हैं। उन्होने बताया कि घटना के पश्चात् बहुत-सी पार्टियों के नेता एवं कार्यकर्ता आए जिन्होंने मात्र आश्वासन दिया लेकिन जिस प्रकार से उत्तराखण्ड की परिस्थितियाँ हैं उससे तो नहीं लगता कि कुछ ठोस कदम उठाए जाएंगे, इसलिए हमारे संगठन एवं सभी ग्रामीणों को मिलकर ही जल की व्यवस्था को सुचारू रूप से व्यवस्थित करना पड़ेगा। 



धारी ग्राम से  हमारे “उत्तराखण्ड गढ़कुमाऊँ क्षेत्रीय संगठन” के कार्यकर्ता अनुज भट्ट जी जब बगेढ़ नामक जल स्रोत के पास पहुँचे तो उन्होंने बताया कि हाल ही के वर्षों में वज्रपात यानी आसमानी बिजली गिरने से होने वाली मौतों की तादाद तेजी से बढ़ रही है इसके पीछे का कारण जंगलो की आग, अनियोजित शहरीकरण और वृक्षों की अन्धाधुंध कटाई है।

क्षतिग्रस्त स्थान पर स्थानीय युवा


जिस समय यह घटना हुई उस समय संगठन कार्यकर्ता अंकित जुगराण जी संगठन के अन्य सदस्यों पंकज जी, अजय जी, अतुल जी, ललित जी, युगल जी एवं मनोज जी  के साथ गदेरा स्थित दुकान में संगोष्ठी कर रहे थे तभी अचानक से पानी का सैलाब आया और देखते ही देखते पीने के पानी की दोनो टंकियो को बहा ले गया। 



अंकित जी का कहना है कि वह दृश्य बहुत ही भयावह था परन्तु बाबा केदार और माँ धारी देवी की कृपा से किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।

मकान के अंदर मलवा


संगठन के कार्यकर्ता भुवनेश प्रसाद जोशी जी का घर भी इस सैलाब में कुछ हद तक क्षतिग्रस्त हुआ है उनकी दुकान के अन्दर भी पानी घुसा है जिससे दुकान में रखा सामान खराब हो चुका है।



अन्त में यही प्रश्न रह जाता है कि आखिर कब तक उत्तराखण्ड प्राकृतिक आपदाओं की मार झेलता रहेगा? कब तक हम लोग यूं ही मूकदर्शक बन कर रहेंगे? कब तक राजनेताओं के खोखले वादों से जनता त्रस्त रहेगी? अब समय आगया है कि अपने जंगल, अपनी जमीन, अपना जीवन और अपने उत्तराखण्ड के विकास के लिए हम सभी क्षेत्रवासियों को एकत्रित होकर आगे आना पड़ेगा। अपने क्षेत्र की बागडोर अब हम स्वयं अपने हाथों में लेंगे जिससे कि क्षेत्र का विकास हो। 

इस दुख की घड़ी में “उत्तराखण्ड गढ़कुमाऊँ क्षेत्रीय संगठन” धारी ग्राम के साथ खड़ा है और ग्राम प्रधान सोहन प्रसाद पाण्डेय जी को आश्वासन देता है कि तन-मन-धन से जो भी सहायता बन पड़ेगी संगठन के धारी ग्राम स्तर प्रतिनिधि अनुज भट्ट जी के द्वारा मुहैया करवाई जाएगी।

न्यूज

डॉ. नवीन पाण्डेय


Sunday, 23 May 2021

उत्तराखंड गढ़कुमाऊं क्षेत्रीय संगठन की जिलास्तरीय बैठक




आज रविवार दिनांक 23-05-2021 को उत्तराखण्ड गढकुमाऊँ क्षेत्रीय संगठन की जिला स्तर प्रतिनिधियों की मीटिंग हुई, जिसमें सभी तेरह जिलों के संयोजक शामिल हुए और संगठन के विकास हेतु अपने-अपने विचार प्रस्तुत किये। संगठन को संचालित करते हुए डॉ. नवीन पाण्डेय ने कहा कि यदि हम एक श्रृंखला के माध्यम से सर्वप्रथम जिला स्तर प्रतिनिधि, तत्पश्चात् विधानसभा प्रतिनिधि, ब्लॉक स्तर प्रतिनिधि, क्षेत्र स्तर प्रतिनिधि, ग्राम स्तर प्रतिनिधि कार्यकर्ता निर्माण पर बल देना होगा। यह प्रक्रिया तब तक सम्भव नही हो सकेगी जब तक कि हम अपनत्व की भावना से संगठन में नही जुड़ेंगे।

कार्यकर्ता निर्माण पर बल

इसी के साथ देहरादून जिला संयोजक बिमल पाण्डेय जी ने कार्यकर्ता निर्माण पर बल देते हुए कहा कि, जब तक ग्राम स्तर पर कार्यकर्ता निर्माण नहीं होंगे तब तक संगठन में मजबूती नही आएगी और संगठन का अगला कदम यही होगा कि, अब जिला स्तर प्रतिनिधि अपनी यह भूमिका सुनिश्चित् कर लें कि, वह  विधानसभा स्तर के प्रतिनिधियों का अन्वेषण करके उनको यथाशीघ्र विधानसभा प्रतिनिधित्व सौंप दें जिससे कि सत्तर विधानसभा प्रतिनिधि संगठन में कार्यरत होंगे।

स्कूली शिक्षा पर विचार

इसी सभा में धीरेन्द्र कार्की जी एवं हरीश कार्की जी जो कि पिथौरागढ़ से हैं उन्होने स्कूली शिक्षा को सुधारने एवं मानव चरित्र निर्माण में भागीदारी निभाने के लिए किस प्रकार से बच्चों का भविष्य उज्ज्वल हो उनके लिए छोटे-छोटे टूलकिट बनाने की सलाह दी।

हर्बल खेती पर विचार

अल्मोडा जिला संयोजक विपिन पाण्डेय जी ने गाँव-गाँव में बंजर पड़े खेतों को किस प्रकार हर्बल खेती में तब्दील किया जाए इस पर अपने विचार प्रस्तुत किये। साथ ही संगठन के मीडिया प्रभारी नवीन खन्तवाल जी ने कहा कि संगठन में सभी कार्यों को जन-जन तक कैसे पहुँचाया जाए, इसमें सोशल मीडिया की क्या भूमिका होनी चाहिए।

स्थानिय स्तर पर क्या कार्य हो रहें हैं, इसपर रखी जाए नजर

संगठन में इन्स्टाग्राम एवं फेसबुक संचालक सुमित सेमवाल जी एवं पौडी जिला संयोजक शुभम पाण्डेय जी ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि सरकारें क्षेत्र में क्या कार्य कर रही है यदि हम सब उन कार्यों की खबर लेते रहें उन कार्यों का ब्यौरा सरकार से माँगे कि सच में धरातल पर यह कार्य हुआ है या नही, तो हम इस संगठन के माध्यम से अपने क्षेत्र में मजबूती ला सकते हैं और उन सभी रुके हुए कार्यों को सुचारु रूप से पूर्ण करने में समर्थ होंगे।

ग्रामीण क्षेत्रों में खेती के लिए चुनौतीपूर्ण स्थितियां

अल्मोड़ा जिला से ग्राम प्रतिनिधि  सोनिया जी ने ग्रामीण क्षेत्रों की खेती सम्बन्धी समस्या को उजागर करते हुए कहा कि फसलों को किस प्रकार से जंगली जानवर तबाह कर रहे हैं उस पर ध्यान दिया जाए और इसके समाधान के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं।

संगठित रहने की पहल

घनसाली विधानसभा संयोजक विजय प्रकाश जी ने कहा कि जब तक हम संगठित नही रहेंगे तब तक हमारी आवाज कोई नही सुनेगा अतः संगठन के अन्तर्गत हम सभी संगठित होकर बडे से बडे कार्य को आसानी से पूरा कर सकते हैं इसके लिये हमें कडी मेहनत करनी पडेगी जिस प्रकार से बिना मेहनत के तो सेर के मुह में मृग भी प्रवेश नही करता। जिला महिला मोर्चा संयोजक सुनीता पाण्डेय जी ने कहा कि हम दुनिया के किसी भी कार्य को कर सकते हैं लेकिन इसके लिए हमे संगठन को मजबूत करना पड़ेगा।

भ्रष्टचार को रोकने के लिए हों जागरुक

अल्मोडा जिला सहसंयोजक संजय जी ने बताया कि किस प्रकार से प्रशासन की योजनाओं में भ्रष्टाचार को बढावा दिया जा रहा है अतः इस भ्रष्टाचार को रोकने के लिए हमें जागरुक होना पडेगा और वह जागरुकता तब ही संभव है जब हम संगठित होंगे।

निष्कर्ष- 

आज की सभा में उपस्थित संगठन के सभी सदस्यों ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए संगठन की रूपरेखा तथा संगठन के उद्देश्यों को सही दिशा में कैंसे ले जाया जाए इस विषय पर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी तरह आगे भी संगठन के सभी कार्यकर्ता अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए कार्य करते रहें।  



जिलास्तर प्रतिनिधि


बागेश्वर- चन्द्रशेखर जी


चमोली-प्रदीप मैखुरी जी एवं समीर गौड़ जी


अल्मोड़ा- विपिन पाण्डेय जी, गिरीश उपाध्याय एवं संजय करगेती जी


रुद्रप्रयाग- मोहित भट्ट जी, सुमित गैरोला जी एवं अनोध गौड़ जी


उधमसिंह नगर- जीतेन्द्र जी


टिहरी गढ़वाल- डॉ. नवीन पाण्डेय जी, विजय रतूड़ी जी एवं गणेश फोन्दणी जी


देहरादून- बिमल पाण्डेय जी, अमित चमोली जी एवं सुनील बरमोला जी


हरिद्वार- गणेश बिष्ठियाना जी


चम्पावत- कृष्णा फर्त्याल जी


पौड़ी- शुभम जी, पूनम जी एवं कामाक्षा जी


पिथौरागढ़- धीरेन्द्र जी एवं हरीश जी


उत्तरकाशी- रविसागर जी एवं कैलाश जी


नैनीताल- गौरव बहुगुणा जी


Friday, 21 May 2021

कुछ प्रश्न हैं जो उत्तराखण्ड वासियों के हक के लिए उठे हैं




कुछ प्रश्न हैं जो उत्तराखण्ड वासियों के हक के लिए उठे हैं


👉 अत्यधिक मीठा बनकर रहने के कारण ही उत्तराखण्डियों को उनके हकों से वंचित रखा जाता है


👉 राजनैतिक मर्यादा "जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी" के फार्मूले पर भी हक़ से वंचित हैं उत्तराखंडी


👉 दिल्ली में 35 लाख की आबादी पर "शून्य" प्रतिनिधित्व पर हैं उत्तराखंडी


जब कभी अन्य सामाजिक व्यक्तियों द्वारा राजनैतिक हिस्सेदारी पर ये प्रश्न किया जाता है कि क्या "उत्तराखंडी" विधायक, सांसद बनकर ही उत्तराखण्डियों का भला हो सकता है, तो उत्तराखंड में क्यों नहीं हुआ ? अमूमन ये प्रश्न दिल्ली के परिपेक्ष में उत्तराखण्डियों की राजनैतिक हिस्सेदारी को ले कर किया जाता हैं। गौरतलब है कि दिल्ली में उत्तराखण्डियों की राजनैतिक हिस्सेदारी का बिगुल दिल्ली में भी अब बड़े ही शौर्य के साथ उत्तराखंडी समाज द्वारा फुका जा रहा है। इतिहास में ये प्रश्न अग्रेजों द्वारा भी कभी गांधी एवं अन्य राष्ट्रीय नेताओं से पूछा गया था। जो प्रश्न अंग्रेजी राज को एक दम सटीक लगता था बाद में उनका सटीक सवाल अंग्रेजों पर ही भारी पड़ गया। सटीक प्रश्न का सटीक उत्तर तो ये था कि राजनैतिक मर्यादा ये कहती है "जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी"। हम (उत्तराखंडी समाज) राजनैतिक मर्यादा के भीतर ही अपना हक़ मांग रहे हैं। उत्तराखंडी समाज राष्ट्र का वो पुत्र हैं जो मध्य में खड़ा सब देख रहा है कि क्षेत्र के नाम पर, प्रांत के नाम पर, जाती के नाम पर, धर्म के नाम पर सबको कुछ न कुछ मिला किन्तु उत्तराखंडी समाज को नहीं, क्योंकि उसने कभी इन आधारों पर मांग ही नहीं की और मांग उसने इसलिए नहीं की क्योंकि उत्तराखंडी की समझ अनंत है।

आज उत्तराखंडी समाज एक सच के मध्य में खड़ा है और वो सच हैं 35 लाख की आबादी पर शून्य प्रतिनिधित्व। वास्तव में अंग्रेजों के प्रश्न का सही उत्तर तो ये था कि तुम कौन हो हमारी सीमा तय करने वाले देश हमारा, लोग हमारे, शक्ति हमारी तो राज भी हमारा हमें अपने हालात कैसे संभालने है ये हम पर छोड़ दो, और चले जाओ हमारा देश छोड़ कर।

एक निवेदन है आप उत्तराखंडी समाज के स्वघोषित प्रतिनिधियों से कि अगली बार जब ये प्रश्न आपके सामने आए तो इस बार प्रश्न पर चुप मत रहिएगा, सवाल पर सवाल और सम्पूर्ण सवालों का एक ही उत्तर को समझिए और अपना लक्ष्य भेधी अचूक उत्तर दीजिए। वास्तव में प्रश्न के पीछे ये बोखलाहट हैं कि कहीं कुर्सी न खिसक जाय। आपसे ये प्रश्न लगातार और बार - बार किया जाएगा, आपसे पूछा जाएगा और आपके प्रतिनिधित्व की आवाज को दबाने का प्रयास भी होगा। किन्तु आप हिमालय की तरह अडिग रहना, किंचित भी मत घबराना, अभय होकर आगे बढ़ना और तब तक हार मत मानना जब तक अपना वजूद राजनैतिक पृष्ठिभूमि पर न बना दो। एक बात हमेशा याद रखिए

कर्म की वेदी में खून पसीने का अर्ग ही राजनीति की प्रचंड अग्नि को प्रदर्शित करेगा।


#उत्तराखंड गढ़ कुमाऊँ क्षेत्रीय संगठन 

     सुनील बरमोला

Wednesday, 19 May 2021

वीरान होते गांव और तमाशबीन बनी सरकार



मैं बात कर रहा हूं, भारतवर्ष के पवित्र स्थानों में से एक बद्रीनाथ जी की गोद में बसे हुए सुंदर एवं रमणीक "माणा" गांव की। यह गांव उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है और यह भारत की सीमा का अंतिम गांव है। इस गांव का नाम भगवान शिव के भक्त मणिभद्र के नाम से पड़ा है,यहां से 55 किलोमीटर आगे चाइना बॅाडर लग जाता है। 

यहां अधिकतर भोटीया जन जाति रहती है, वर्ष 2000  से पहले यहां के लोगों में काफी उत्सुकता और अपने काम के प्रति इनकी जागरूकता बहुत ही प्रभावशाली रहती थी, क्योंकि यहां के लोगों के पास भगवान की दी हुई  प्रकृति के द्वारा अलौकिक रमणीयता अध्यात्म और पुरातन संस्कृति की अद्भुत कला एवं यंत्र विज्ञान है, जिससे इन लोगों का कार्य वहां के स्थलों को सही से बाहरी पर्यटकों को रूबरू कराना होता था। तिब्बत और माणा गांव वालों का व्यापार अधिक मात्रा में होता था। इस क्षेत्र की सबसे विश्वसनीय बात थी ये इन्टर नेशनल सीमा से सटा हुआ और प्रसिद्ध धामों में एक बद्रीनाथ धाम में स्थित है। पर जैसे-जैसे समय बीतता गया उत्तराखंड राज्य बना इसकी स्थिति और अच्छी होने के बजाय और बिगड़ती गयी, नाकाम सरकारों ने अपना डंडा चलाय धीरे-धीरे वहां के सभी कार्य शैली वहां के छोटे छोटे उद्योगों को बाहरी लोगों को सौंप दिया पैसों का लालच देकर। उन पैसों से दो चार दिन का खर्चा तो चला पर जैसे ही लोगों ने अपना हक मांगना चाहा सरकारों ने अपने सत्ता के जंजीरों का रास्ता दिखा दिया कोर्ट जाओ जिला अधिकारी पर जाओ बस आम आदमी भटकता रह गया, और सत्ता पर बैठे हूकुमत जादे अपनी रंगीन सियासत खिंचते चले गए। 




पलायन कैसे हुआ ?

1- बात थी माणा गांव की वहां के उनी वस्त्रो गलीचो, कालीन,दन, शाल, इन सब हस्त कलाओं का बन्द होना , सरकारों की ग़लत नीतीयो की वजह से गांव के लोगों का वंहा से पलायन को मजबूर होना। 

 2- कृषि क्षेत्र में माणा सबसे आगे था परन्तु आज सबसे पीछे है।  यहां के आलू आज भी विश्व विख्यात हैं यहां के लोग खेती में और खासकर आलू की पैदावार में बहुत कुशल हैं राजमा की दालें और फरण जिसकी खुशबू के दीवाने विदेशी भी हुआ करते थे इनकी पैदावार इतनी अधिक थी कि दूसरे राज्यों से लेने वालों को कतार में रहना पड़ता था परन्तु सत्ता के लालची लोगो नें इस क्षेत्र को उठाने के बजाय वंहा की जनजाती को पलायन पर मजबूर कर दिया है। 

3- माणा जड़ी बूटियों का बादशाह है पर आज खाली हाथ है जडी बूटियां ऐसी की हर रोग का इलाज संभव है शारीरिक हो या मानसिक पुरानी हो या लम्बी बीमारी सभी असाध्य रोगों का इलाज है इनके पास। हनुमान जी इसी गांव के द्रोण गिरि पर्वत पर आये थे संजिवनी लाने यहां की “कीड़ा जड़ी” विश्व प्रख्यात हैं जिनकी डिमांड इंटरनेशनल बाजारों में करोड़ों में है पर निकम्मी सरकारों ने ये सब बाहरी लोगों के हवाले कर दिया है। 

यहां के लोगो के पास इतना रोजगार था कि इनको पलायन करने की आवश्यकता ही नहीं थी बल्कि दूसरों को रोजगार देने की क्षमता इनके अंदर थी। 

विशेष बद्रीनाथ मंदिर बंद होने पर भगवान बदरी नारायण को पहनाया जाने वाला घृत कंबल भी माणा की महिलाए ही तैयार करती हैं। 



4- मुख्य बिन्दु में सबसे दूर्भाग्यपूर्ण योजना हम अपने क्षेत्रों में कोई भी निर्माण कोई भी उद्योग कैसे करें? कोई भी बाहरी आकर हमारे क्षैत्रो में होटल, रेस्टोरेंट ,भवन इत्यादि खोल देता है बाहरी लोगों को जमीन कैसे ये सरकार दे सकती है? बाहरी लोगो का यहां बसना और यहां के लोगों को बाहर का रास्ता दिखाना इससे बड़ा दुर्भाग्य उत्तराखंड का क्या हो सकता है? हम कहां जाएं? पर अब नही मखमल के गद्दो पर बैठ बैठकर हमारे उत्तराखंड का खून चूसने वालों सत्ताधारियों जनता अब बर्दाश्त नहीं करेंगी और यहां कि देवभूमि तुम्हें कभी माफ करेंगी अब समय आगया है कि हम सभी क्षेत्र हितैषी अपने-अपने क्षेत्रों को पहचानने की कोशिश करे और उसका सही श्रृंगार करने की पूरी तरह से समर्पित हो उठें। 

उस पर पड़ी ये बाँधपरियोजनाओं की बड़े-बड़े होटलों की खननमाफियों की व्यसनी लोगो की बेड़ियों को तोड़ने की है। उसे सच में एक सुंदर, स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त देवभूमि उत्तराखंड बनाने की है। हां जब कोई हमसे पूछे कि आप कहां से हो तो हम गर्व से कह सके कि हम उस देवभूमि से हैं, जिसका वर्णन स्कन्द पुराण के केदार खंड में हुआ है, जैसा वहां लिखा है अभी भी बिल्कुल वैसा ही है ऐसा हमें महसूस हो। 


प्रेषक- प्रदीप मैखुरी चमोली

Tuesday, 18 May 2021

उत्तराखंड के विकास के लिए यह 9 बिंदु बहुत महत्वपूर्ण हैं



उत्तराखण्ड राज्य के विकास के लिये नियोजन करते समय अथवा नीति निर्धारित करते समय कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। इस दृष्टि से कुछ महत्त्वपूर्ण सुझाव निम्नवत हैं -


1. उत्तराखण्ड राज्य और गांव के क्षेत्रीय विकास एवं आत्मनिर्भरता की दृष्टि से सर्वप्रथम स्थानीय मानवीय संसाधनों, स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों, वित्तीय संसाधनों, भौगोलिक परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं का गहन अध्ययन तथा सर्वेक्षण किया जाए तथा तदनुरूप नीतियों का निर्धारण एवं कार्यक्रमों का संचालन किया जाए।

उत्तराखंड राज्य के ग्रामीण इलाकों मैं विकास के लिये अरबों रुपयों का प्रावधान किया गया, लेकिन न ही ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं का निराकरण हुआ और न ही आर्थिक आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त हुआ। उपलब्ध संसाधनों का संतुलित दोहन न होने के कारण ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया। उत्तराखंड राज्य को विकास के लिये धन तो दिया गया, लेकिन धन के समुचित नियोजित उपयोग की व्यवस्था नहीं की गई। वस्तुतः स्थानीय आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुसार नियोजन की कारगर व्यवस्था नहीं की गई। जिसके परिणामस्वरूप आज तक गांवो मैं जनजीवन के वास्तविक कष्टों का अन्त नहीं हो पाया है।


2. ग्रामीणों  के क्षेत्रीय विकास के लिये नियोजन निर्धारण के समय महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान के कार्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में महिलाएँ घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित रही हैं। अतः किसी  है कि उसके निर्माण तथा क्रियान्वयन में उनकी सक्रिय सहभागिता हो। वस्तुतः लघु उद्योग, कृषि, पशुपालन, वन शिक्षा और स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यक्रमों के नियमन तथा क्रियान्वयन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया जाए तो उसके वांछित परिणाम निकलेंगे।



3.उत्तराखंड  क्षेत्र के युवाओं का पलायन रोकने और बढ़ती बेरोजगारी दूर करने के लिये यह आवश्यक है कि पर्वतीय अंचलों के अनुरूप योजनाएँ बनाकर उद्योग धन्धे स्थापित किए जाएँ। बेरोजगारी की समस्या के निराकरण के लिये लघु उद्योग कारगर हो सकते हैं। अतः स्थानीय संसाधनों के अनुरूप लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना का प्रयास किया जाना चाहिए। ये उद्योग व्यक्तिगत तथा सरकारी तौर पर चलाए जा सकते हैं। ऐसे उद्योगों में लकड़ी उद्योग, माचिस, जड़ी-बूटी पर आधारित उद्योग; कंबल, कालीन उद्योग और फल उद्योग आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। हिमाचल क्षेत्र में स्थानीय संसाधनों पर आधारित अनेक पारम्परिक कुटीर उद्योग भी प्रचलन में रहे जो गुणात्मक आधार पर उपयोगिता रखते हैं। ऐसे उद्योगों में कृषि यंत्रों का निर्माण, भीमल व तोण की रस्सियों का निर्माण, रिंगाल व बांस द्वारा विभिन्न उपयोगी वस्तुओं का निर्माण, करघा निर्मित कंबल व ऊनी वस्तुओं को शामिल किया जा सकता है। दुर्भाग्य से पूरे उत्तराखंड ग्रामीण क्षेत्र से परम्परागत उद्योग गाँवों से लुप्त होते जा रहे हैं। मौजूदा समय में पर्वतीय विकास नीतियों के अन्तर्गत इन उद्योगों को संरक्षण दिए जाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही गैर पारम्परिक उद्योगों जैसे अंगौरा खरगोश पालन, कुक्कुट पालन, मीनपालन, मशरूम उत्पादन तथा रेशम उत्पादन को प्रोत्साहित करके क्षेत्रीय जनता की अर्थव्यवस्था को सुधारने का प्रयास किया जा सकता है। नवीन अपारम्परिक उद्योगों के विकास के साथ ही पारम्परिक व्यवसायों के पुनरुद्धार एवं संरक्षण की भी आवश्यकता है और इस पर यथोचित ध्यान दिया जाना चाहिए।


4. क्षेत्रीय विकास के लिये शिक्षा का विशेष महत्त्व होता है।उत्तराखंड ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार ने प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल, उच्चतम विद्यालय, इण्टर कॉलेज एवं महाविद्यालय खुलवाए हैं। लेकिन अधिकांश विद्यालयों में छात्र संख्या के अनुपात में शिक्षक नहीं हैं। अतः शिक्षक पर्याप्त मात्रा में नियुक्त किए जाने चाहिए तथा विद्यालयों में शिक्षण सुविधाओं को समुचित मात्रा में जुटाया जाना चाहिए ताकि शिक्षा का स्तर उन्नत हो।


5. शैक्षिक विकास के साथ ही आत्म निर्भरता की दृष्टि से तकनीकी शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अभी भी शिक्षण संस्थाओं की स्थापना के बावजूद पहाड़ी इलाकों में तकनीकी शिक्षा का पूर्णतः अभाव बना हुआ है। स्थानीय, भौगोलिक एवं भौतिक परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों को प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है ताकि युवा वर्ग आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो सके।।


6. कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु जहाँ कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक साधनों को प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है, वहीं कृषि निवेश, खाद, बीज हेतु बिक्री केन्द्र, सिंचाई साधन, खाद्यान्न मार्केट की भी व्यवस्था कीये जाने की आवश्यकता है। विगत योजनाओं में इस क्षेत्र में कुछ प्रयास किए गए हैं, जिन्हें और अधिक सबल और विस्तृत किए जाने की आवश्यकता है।


7. फलोद्यान पर्वतीय अंचल में आर्थिक समृद्धि के लिये विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। क्योंकि पर्वतीय अंचल में कृषि व्यवसाय बहुत अधिक लाभ कर रही है। यद्यपि बागवानी विकास के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। परन्तु मार्केटिंग और प्रोसेसिंग को उपयुक्त एवं स्थाई ढाँचे का अभी अभाव है। फलोद्यान से पर्याप्त लाभ प्राप्त करने के लिये इस कमी को दूर किया जाना चाहिए तथा फलों के भण्डारण, वितरण की भी व्यवस्था की जानी चाहिए, साथ ही उद्यानिकी के प्रशिक्षण के लिये ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर विभिन्न प्रशिक्षण शिविर लगाए जाने चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोग इस ओर प्रवृत्त हों।



8.पशुपालन तथा दुग्ध विकास कार्यक्रम को सहायक व्यवसाय के रूप में विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं और उसके लिये विभिन्न अवस्थापन सुविधाओं, प्रसार सुविधाओं तथा प्रबन्ध व्यवस्था आदि के लिये विनियोजन में उत्तरोत्तर वृद्धि की गई है। लेकिन मिश्रित वनों के लुप्त होने, चारागाहों के विनाश और तराई के शीतकालीन चारागाहों में कृषि के कारण पशुपालन का ह्रास हुआ है। इसके साथ ही पशुओं की नस्ल एवं संख्या का भी यथोचित विस्तार नहीं हो पाया है। दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से स्थानीय दुधारू पशुओं की क्रास ब्रीड तथा अन्य उन्नत नस्ल के पशुओं के प्रतिस्थापन की आवश्यकता है। क्षेत्र की विषम भौगोलिक स्थिति को देखते हुए पशु 

 9. उत्तराखंड राज्य में विगत वर्षों में वन सम्पदा का काफी ह्रास हुआ तथा पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण संतुलन में भी ह्रास हुआ है। पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी संतुलन एक राष्ट्रीय महत्त्व की समस्या होने के कारण इस कार्यक्रम को भी अवश्य प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्र में भूस्खलन एवं भूक्षरण को रोकने के लिये तथा पर्यावरण की समस्या को देखते हुए वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण के कार्यक्रम को भी अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए।

Monday, 17 May 2021

उत्तराखंड एक समृद्ध राज्य, असमर्थ भावनाओं का शिकार

 




देश के सत्ताईसवें राज्य उत्तराखंड को प्रकृति ने बहुत खूबसूरती प्रदान की है। खूबसूरती के साथ ही कई बहुमूल्य औषधियां, पर्यटन स्थल, धार्मिक स्थल भी इस राज्य में हैं, जिनके बारे में शायद राज्य के रहवासियों से ज्यादा बाहर के लोग जानते हैं। कहने का तात्पर्य है कि, 'कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि'। जिस जिंदगी को तलाशने इस राज्य के बाशिंदे पलायन कर जाते हैं, जिंदगी का वह मर्म इस राज्य से ज्यादा बहुत कम ही कहीं देखने को मिलेगा। 

इजरायल से बहुत कुछ सीख सकता है उत्तराखंड


आप लोग इजरायल देश का नाम तो जानते होंगे। एक ऐसा देश जो चारों ओर से दुश्मनों से घिरा है, जिसके बाशिंदे यानी यहूदियों को हिटलर ने गैसे चैंबर में डालकर लाखों की संख्या में मारा था। 1948 से पहले जिनके अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा था, उन्होंने आज एक विकसित देश का निर्माण कर दिया। इस देश ने 6 दिनों में इजरायल के 6 देशों को जंग में धूल चटा दी थी। लेकिन आज हम इस देश की युद्ध नीति की नहीं बल्कि इस बात की चर्चा करते हैं कि यह देश जो 1948 से पहले अस्तित्व में नहीं था, जिसकी आबादी आज भी उत्तराखंड से कम है, जिसके पास इनती जमीन भी नहीं है जितनी उत्तराखंड के पास वो इतना जल्दी इतना विकसित हुआ कैसे। हालांकि एक राज्य और देश के बीच तुलना करना बहुत वाजिब बात नहीं लेकिन, सीख लेने के लिए हर रास्ता खुला रहता है।

छोटे से देश के बड़े कारनामे

तो, आज इजरायल तकनीक के मामले में 5 सबसे शक्तिशाली देशों में है। इस देश का जब निर्माण हुआ तो इसके निर्माताओं को पता था कि, हमारे पास न इतनी जमीन है कि जिसे उपजाऊ बनाकर हम पैसा कमाएं, न इतनी प्राकृतिक सुंदरता कि टूरिज्म को बढ़ावा दें, न तेल के कुएं..कुलमिलाकर देखें तो कुछ भी ऐसा नहीं जिससे वो प्राकृतिक रूप से पैसा बना पाते। लेकिन यह सोचकर वह माथा पकड़कर रोने नहीं लगे। उन्हें पता था कि हम तकनीकी मामलों में अपनी पकड़ बनाकर दुनिया में अपनी पहचान बना सकते हैं।

 

इजरायल ने टेक्नॉलजी पर तन-मन-धन से ध्यान दिया। आपको हैरानी होगी उन्होंने अपने तकनीक को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने के लिए एक संस्था का ही निर्माण कर दिया जिसका नाम है, टेक ट्रांसफर ऑर्गनाइजेशन(TTO)। इस संस्था का निर्माण इसलिए हुआ कि यदि सरकार सामान बेचने में कामयाब न हो, वैज्ञानिक बेचने में कामयाब न हो तो इस संस्था के लोग दूसरे देशों तक पहुंचकर उस तकनीक या सामना को बेचें। हालांकि इसके लिए उन्होंने पहले अपने देश में मौजुद थोड़े बहुत संसाधनों को तकनीक को मजबूत करने के लिए ढूंढा और उसके बाद उसे इस्तेमाल में लाए। 


विकास करने की भावना की कमी

अब उत्तराखंड पर आ जाते हैं, यहां राजनीति से बढ़कर कुछ नहीं है। राजनीति, सत्ता तो दिला सकती है पर एक राज्य और देश के हर व्यक्ति को रोजगार नहीं। किसी भी देश या राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए सबसे पहली आवश्यकता है भावना।  अगर उत्तराखंड के लोग भी अपने, संसाधनों अपनी ताकत को पहचानते तो, युवा अवस्था में पहुंच चुका यह राज्य देश का सिरमौर हो सकता था। राजनेता चाहते तो जैसे इजरायल ने TTO का निर्माण अपनी संसाधनों को बेचने के लिए किया वैसी ही संस्था का निर्माण उत्तराखंड में मौजूद वनस्पतियों, औषधियों की खोज के लिए बनायी जाती। जो न केवल वनस्पति और औषधी को खोजती बल्कि उनके अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल को लेकर शोध कार्य करवाती। ऐसा करके न जाने कितने युवाओं को सरकार रोजगार दे सकती थी।


 


खैर राज्य के प्रति राज्य के बाशिंदों का ही लगाव आज बहुत कम देखने को मिलता है, तो राजनेताओं के तो क्या ही कहने। हालांकि गलति युवाओं की भी नहीं है, संसाधनों के अभाव में राज्य से बाहर गया युवा, उस तरह से उत्तराखंड के प्रति जुड़ाव महसूस नहीं करता जैसा होना चाहिए। इसमें सरकार की नाकामी तो है, लेकिन सारा ठीकरा नताओं पर फोड़ देने से होना कुछ है नहीं।  

तो नाकामी क्या है, और किसकी है?

तो नाकामी क्या है, और किसकी है? नाकामी के बिंदुओं पर बात करने से अच्छा एक उदाहरण आपको दिया जाए। उत्तराखंड के जंगलों में कड़ी पत्ता भारी संख्या में होता है, इस कड़ी पत्ते को करी पत्ता, गंधेला और उत्तराखंड की स्थानीय बोलियों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इस कड़ी पत्ते की कीमत 1000 रूपये प्रतिकिलो से भी ज्यादा है। अब राज्य के लोग अगर चाहते, या सरकार की नीयत होती तो इस कड़ी पत्ते की खेती से ही कई लोगों का पेट पाला जा सकता था। इस कड़ी पत्ते पर शोध करके, इसका कई तरह प्रयोग करने के बारे में हम दुनिया को बता सकते थे। जैसा कि इजरायल अपनी तकनीक को विकसित करके पूरी दुनिया में उसका प्रचार करता है। इस छोटे से पौधे से भी राज्य की जनता को और सरकार को भी फायदा पहुंच सकता था। 


खैर हम तो अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना ज्यादा पसंद करते हैं। जब इन संसाधनों को बाहर से आए लोग इस्तेमाल करेंगे और धनासेठ बन जाएंगे तब हमें होश आएगा। तो ऐसी ही कई नाकामियों की कहानियां, यही नाकमी है और नाकामी हमारी ही है। अगर हम अभी भी नहीं चेते तो नाकामी की कहानियां आने वाले समय में उत्तराखंड के लोगों से सुनी जा सकती हैं, जब दूसरे लोग हमारी धरती पर आकर हमें बताएंगे कि, देखिये यह पौधा इतने काम का था और इतने  तरीकों से अन्य कामों में भी लाया जा सकता है। उत्तराखंडी लोग तब कहेंगे कि, यह तो हमें भी पता था लेकिन समय पर सुध नहीं आयी हमें। तो बिंदुवार नाकामियों को समझाना बेवकूफी ही होगी, जिसको समझना है उसके लिए इशारा ही काफी है।



अब खुद को पहचानने का वक्त

अब समझना आम नागरिकों को है कि, उत्तराखंड को अब राजनीति नहीं, वह सोच चाहिए जो इस राज्य का भविष्य सुधार सके। ऐस राजनीतिज्ञ चाहिए जो बैंक बैलेंस से ज्यादा राज्य को विकसित करने के लिए बौद्धिक धन का इस्तेमाल करें। एक प्रार्थना यह है कि, कोई भी उत्तराखंडी अब कम-से-कम यह कहना बंद कर दे कि, आखिर उत्तराखंड में क्या है? पहाड़ी राज्य होने के कारण यहां का विकास होना मुश्किल है? हां, इसके बदले आप बोल सकते हैं कि, हमारे बस का नहीं है, हमें मेहनत नहीं करनी। धन्यवाद............


उत्तराखण्ड में भू कानून की आड़ में क्या चल रहा है खेल

बिना दाँत के व्यक्ति को अगर गन्ना चूसने के लिए दे दिया जाए तो उसकी हालत शायद वैसी ही होगी जैसे कमजोर भू-क़ानून के साथ किसी राज्य की होती है,...