Friday, 2 July 2021

उत्तराखण्ड के पारम्परिक मकानों का परिदृश्य



पहाड़ में परम्परागत बने मकानों में स्थानीय रूप से उपलब्ध पत्थर, मिट्टी अथवा लकड़ी का प्रयोग होता आया है। पत्थर के बने मकान जिन पर मिट्टी के बने गारे से पत्थर की चिनाई की जाती थी। स्थानीय रूप से उपलब्ध मजबूत लकड़ी से दरवाजा, छज्जा अथवा खिड़कियाँ बनाई जाती थी। जिसमें सुन्दर नक्काशी की जाती थी। घर की छत में मोटी चौकोर पाल पड़ता जिसे ‘भरणा’ कहा जाता है। यह चीड़ की लकड़ी का अच्छा माना जाता है।  धुरी में भराणा डालकर छत की दोनों ढलानों में बाँसे रखकर इनके ऊपर बल्लियां रखी जाती है। बल्लियों के ऊपर दादर या फाड़ी हुई लकड़ियाँ बिछाई जाती थी या तो तख्ते चिरवा के लगा दिये जाते हैं। इनके उपर चिकनी मिट्टी के गारे से पंक्तिवार पाथर(पठाल) चौड़े पत्थर बिछ होते हैं। दो पाथर रखा जाता है जिसे तोप कहते हैं। घर के कमरों में चिकनी मिट्टी और भूसी मिला कर फर्श बिछाया जाता है। जिसे पाल भी कहा जाता है तथा इसे गोबर से लीपा जाता है। दीवारों में एक हाथ की ऊंचाई तक गोबर से लीपा जाता है। दीवारों में एक हाथ की ऊँचाई तर गेरू का लेपन कर बिस्वार से तीन या पाँच की धारा में वसुधारा डाली जाती है। गेरु औ बिस्वार से ही ऐपणि पड़ते हैं। अलग अलग धार्मिक आयोजनों व कर्मकाण्डों में इनका स्वरूप भिन्न होता है। हर घर के भीतरी कक्ष में पूर्व या उत्तर दिशा के कोने में पूजा के लिए मिट्टी की वेदी बनाई जाती है जो द्याप्ता अथवा ठ्या (देवस्थान) के नाम से जाना जाता है। बाखली में मकान एक बराबर ऊँचाई के तथा दो मंजिला या तीन मंजिला होते थे।


पहली मंजिल में छज्जे के आगे पत्थरों की सबेली (लाईन) करीब एक हाथ आगे को निकली रहती है जो झाप कहलाती है। ऊपरी दूसरी मंजिल में दोनों तरफ ढालदार छत होती है जिसे पटाल या स्लेट से छाया जाता है नीचे का भाग गोठ (बेसमेंन्ट) के नाम से जाना जाता है जिसमें पालतू पशु रहते हैं और ऊपरी मंजिल में पारिवारिक सदस्य दो मंजिल के आगे वाले हिस्से को चाख(मकान का बराम्दा) कहते हैं जो बैठक का कमरा होता है। सभी घरों के आगे पटाल बछा पटांगण होता है जिसके आगे करीब एक हाथ चौड़ी दीवार होती है जो बैठने के भी काम आती है।

पहाड़ की संस्कृति, रहन-सहन, भेष-भूसा एवं खान-पान सामाजिक जीवन में लोकोक्तियाँ, मुहावरे, किस्से-कहानियाँ, प्रतीक तथा बिम्ब ऐसे हैं जो पहाड़ में जिये और पहाड़ को जाने बिना समझ पाना नामुमकिन हैं। ये बात अलग है कि समय प्रवाह में न तो आज गाँव की लम्बी-२ बाखलिया रही और न ही उनमें रहने वाले लोग। अब न वहाँ पाथर (पत्थर) की छतें रही, न चाख, गोठ और मलभतेर (अन्दर वाला कमरा) वाले कमरे, न खोईक भिड़ (दिवार) और न चौथर रहे और न पटांगण(आंगन) में बनी ओखली। यदि पलायन के बाद कुछ गाँव अब भी अस्तित्त्व में हैं तो सब धीरे-धीरे लैण्टर के बने आधुनिक सुख-सुविधायुक्त मकान बनने लगे हैं। 



पुराने घरों के खोईक भिड़ (आँगन की दीवार) और चौथर (घर के अन्दर प्रवेश हेतु सीढियाँ) हमारे जीवन के सुख-दु:ख के गवाह हुआ करते थे। खोईक भिड़ व चौथर उन लोगों की समझ से बाहर है, जिन्होंने पहाड़ों के मकान कभी देखें ही नहीं। दरअसल पहाड़ों में ढलान पर बने घरों के आँगन को तीन ओर दीवारों से घेरा जाता है, ये दीवारें सुरक्षा की दृष्टि से तथा बैठने के उपयोग हेतु बनाई जाती हैं। इसी को खोई अर्थात् खोली बोला जाता है। 

वर्तमान दौर में पहाड़ों के आधुनिक मकानों में वह रौनक नहीं रही जो हमारे पारम्परिक मकानों में हुआ करती थी और न ही पहाड़ों के खेत-खलिहानों की रौनक रही। थोड़ा होश संभाला तो पढ़ाई अथवा काम की तलाश में दूसरे शहरों को भाग गये, फिर वहीं शहरी जीवन उन्हें भी रास आने लगा और वहाँ से (शहरों से) लौटकर आये भी तो साथ में शहरी संस्कृति को लेकर ,जहाँ उनके ड्राइंग रूम तक ही उनकी दुनियाँ सीमित रह गयी। दुर्भाग्यवश कोई गाँव में ही अटके रह गये, वे भी तथाकथित सभ्यता का लबादा ओढ़कर मॉर्डन बनने की दौड़ में तथाकथित मॉर्डन तो नहीं हो पाये, लेकिन अपने ठेठ पहाड़ी अन्दाज को भी खो बैठे। गर्मियों के दिनों में चाँदनी रातों की गप-शप हो अथवा जाड़ों में सामूहिक रूप से आग तापने का उपक्रम हो, ये खोईक भिड़ (आँगन की दीवार) सदा गुलजार रहते थे। परन्तु एकाकीपन से दूर सामूहिकता व परस्पर सहयोग का आभास कराते ये खोईक भिड़ अब विलुप्त के कगार पर हैं जो पुराने घरों में खोईक भिड़ मौजूद भी हैं वे उनको गुलजार करने वाले व्यक्तियों के अभाव में निर्जीव बन अन्तिम साँसें गिन रहे हैं।

कार्यकर्ता गढकुमाऊँ संगठन उत्तराखण्ड 

सन्तोष कुमार

5 comments:

  1. मैं भी ऐसा ही घर बनाउंगा।

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  2. यदि ऐसे घर बनने लगे तो ये हमारी संकृति का परिचय होगा जय देवभूमि

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  3. वाह बहुत सुंदर 👌👌🙏🙏🙏🙏 हमारी संस्कृति ❤❤❤❤

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  4. बहुत सुंदर संतोष जी, भविष्य सुंदर होगा अब उत्तराखंड का 💐💐

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  5. Bahut bdiya hoga hamara uttarakhand 💐👌🙏🏻🕉️

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