उत्तराखण्ड राज्य के विकास के लिये नियोजन करते समय अथवा नीति निर्धारित करते समय कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। इस दृष्टि से कुछ महत्त्वपूर्ण सुझाव निम्नवत हैं -
1. उत्तराखण्ड राज्य और गांव के क्षेत्रीय विकास एवं आत्मनिर्भरता की दृष्टि से सर्वप्रथम स्थानीय मानवीय संसाधनों, स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों, वित्तीय संसाधनों, भौगोलिक परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं का गहन अध्ययन तथा सर्वेक्षण किया जाए तथा तदनुरूप नीतियों का निर्धारण एवं कार्यक्रमों का संचालन किया जाए।
उत्तराखंड राज्य के ग्रामीण इलाकों मैं विकास के लिये अरबों रुपयों का प्रावधान किया गया, लेकिन न ही ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं का निराकरण हुआ और न ही आर्थिक आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त हुआ। उपलब्ध संसाधनों का संतुलित दोहन न होने के कारण ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया। उत्तराखंड राज्य को विकास के लिये धन तो दिया गया, लेकिन धन के समुचित नियोजित उपयोग की व्यवस्था नहीं की गई। वस्तुतः स्थानीय आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुसार नियोजन की कारगर व्यवस्था नहीं की गई। जिसके परिणामस्वरूप आज तक गांवो मैं जनजीवन के वास्तविक कष्टों का अन्त नहीं हो पाया है।
2. ग्रामीणों के क्षेत्रीय विकास के लिये नियोजन निर्धारण के समय महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान के कार्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में महिलाएँ घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित रही हैं। अतः किसी है कि उसके निर्माण तथा क्रियान्वयन में उनकी सक्रिय सहभागिता हो। वस्तुतः लघु उद्योग, कृषि, पशुपालन, वन शिक्षा और स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यक्रमों के नियमन तथा क्रियान्वयन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया जाए तो उसके वांछित परिणाम निकलेंगे।
3.उत्तराखंड क्षेत्र के युवाओं का पलायन रोकने और बढ़ती बेरोजगारी दूर करने के लिये यह आवश्यक है कि पर्वतीय अंचलों के अनुरूप योजनाएँ बनाकर उद्योग धन्धे स्थापित किए जाएँ। बेरोजगारी की समस्या के निराकरण के लिये लघु उद्योग कारगर हो सकते हैं। अतः स्थानीय संसाधनों के अनुरूप लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना का प्रयास किया जाना चाहिए। ये उद्योग व्यक्तिगत तथा सरकारी तौर पर चलाए जा सकते हैं। ऐसे उद्योगों में लकड़ी उद्योग, माचिस, जड़ी-बूटी पर आधारित उद्योग; कंबल, कालीन उद्योग और फल उद्योग आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। हिमाचल क्षेत्र में स्थानीय संसाधनों पर आधारित अनेक पारम्परिक कुटीर उद्योग भी प्रचलन में रहे जो गुणात्मक आधार पर उपयोगिता रखते हैं। ऐसे उद्योगों में कृषि यंत्रों का निर्माण, भीमल व तोण की रस्सियों का निर्माण, रिंगाल व बांस द्वारा विभिन्न उपयोगी वस्तुओं का निर्माण, करघा निर्मित कंबल व ऊनी वस्तुओं को शामिल किया जा सकता है। दुर्भाग्य से पूरे उत्तराखंड ग्रामीण क्षेत्र से परम्परागत उद्योग गाँवों से लुप्त होते जा रहे हैं। मौजूदा समय में पर्वतीय विकास नीतियों के अन्तर्गत इन उद्योगों को संरक्षण दिए जाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही गैर पारम्परिक उद्योगों जैसे अंगौरा खरगोश पालन, कुक्कुट पालन, मीनपालन, मशरूम उत्पादन तथा रेशम उत्पादन को प्रोत्साहित करके क्षेत्रीय जनता की अर्थव्यवस्था को सुधारने का प्रयास किया जा सकता है। नवीन अपारम्परिक उद्योगों के विकास के साथ ही पारम्परिक व्यवसायों के पुनरुद्धार एवं संरक्षण की भी आवश्यकता है और इस पर यथोचित ध्यान दिया जाना चाहिए।
4. क्षेत्रीय विकास के लिये शिक्षा का विशेष महत्त्व होता है।उत्तराखंड ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार ने प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल, उच्चतम विद्यालय, इण्टर कॉलेज एवं महाविद्यालय खुलवाए हैं। लेकिन अधिकांश विद्यालयों में छात्र संख्या के अनुपात में शिक्षक नहीं हैं। अतः शिक्षक पर्याप्त मात्रा में नियुक्त किए जाने चाहिए तथा विद्यालयों में शिक्षण सुविधाओं को समुचित मात्रा में जुटाया जाना चाहिए ताकि शिक्षा का स्तर उन्नत हो।
5. शैक्षिक विकास के साथ ही आत्म निर्भरता की दृष्टि से तकनीकी शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अभी भी शिक्षण संस्थाओं की स्थापना के बावजूद पहाड़ी इलाकों में तकनीकी शिक्षा का पूर्णतः अभाव बना हुआ है। स्थानीय, भौगोलिक एवं भौतिक परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों को प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है ताकि युवा वर्ग आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो सके।।
6. कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु जहाँ कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक साधनों को प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है, वहीं कृषि निवेश, खाद, बीज हेतु बिक्री केन्द्र, सिंचाई साधन, खाद्यान्न मार्केट की भी व्यवस्था कीये जाने की आवश्यकता है। विगत योजनाओं में इस क्षेत्र में कुछ प्रयास किए गए हैं, जिन्हें और अधिक सबल और विस्तृत किए जाने की आवश्यकता है।
7. फलोद्यान पर्वतीय अंचल में आर्थिक समृद्धि के लिये विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। क्योंकि पर्वतीय अंचल में कृषि व्यवसाय बहुत अधिक लाभ कर रही है। यद्यपि बागवानी विकास के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। परन्तु मार्केटिंग और प्रोसेसिंग को उपयुक्त एवं स्थाई ढाँचे का अभी अभाव है। फलोद्यान से पर्याप्त लाभ प्राप्त करने के लिये इस कमी को दूर किया जाना चाहिए तथा फलों के भण्डारण, वितरण की भी व्यवस्था की जानी चाहिए, साथ ही उद्यानिकी के प्रशिक्षण के लिये ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर विभिन्न प्रशिक्षण शिविर लगाए जाने चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोग इस ओर प्रवृत्त हों।
8.पशुपालन तथा दुग्ध विकास कार्यक्रम को सहायक व्यवसाय के रूप में विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं और उसके लिये विभिन्न अवस्थापन सुविधाओं, प्रसार सुविधाओं तथा प्रबन्ध व्यवस्था आदि के लिये विनियोजन में उत्तरोत्तर वृद्धि की गई है। लेकिन मिश्रित वनों के लुप्त होने, चारागाहों के विनाश और तराई के शीतकालीन चारागाहों में कृषि के कारण पशुपालन का ह्रास हुआ है। इसके साथ ही पशुओं की नस्ल एवं संख्या का भी यथोचित विस्तार नहीं हो पाया है। दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से स्थानीय दुधारू पशुओं की क्रास ब्रीड तथा अन्य उन्नत नस्ल के पशुओं के प्रतिस्थापन की आवश्यकता है। क्षेत्र की विषम भौगोलिक स्थिति को देखते हुए पशु
9. उत्तराखंड राज्य में विगत वर्षों में वन सम्पदा का काफी ह्रास हुआ तथा पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण संतुलन में भी ह्रास हुआ है। पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी संतुलन एक राष्ट्रीय महत्त्व की समस्या होने के कारण इस कार्यक्रम को भी अवश्य प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्र में भूस्खलन एवं भूक्षरण को रोकने के लिये तथा पर्यावरण की समस्या को देखते हुए वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण के कार्यक्रम को भी अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए।




बहुत ही सराहनीय है
ReplyDeleteबहुत ही उत्तम बात कही आपने बस युवावर्ग का सहयोग मिलेगा तो यह संगठन बहुत आगे जायेगा
ReplyDeleteBilkul shi bola apne 🙏
Deleteबहुत ही उत्तम विचार।।।।आज हमें उत्तराखंड की विभिन्न समस्याओं के निवारण हेतु एकजुट होने की जरूरत है।।
ReplyDeleteसाथ में आज हम लोग को पर्यावरण को संतुलित करने पर भी विचार करना चाहिए । वहा के जो मूल जंगल को बढ़ावा देने पर भी जोर देना की जरूरत हे
ReplyDeleteबहुत ही उत्तम बात कही आपने बस युवावर्ग का सहयोग मिलेगा तो यह संगठन बहुत आगे जायेगा.. . ...बहुत ही सराहनीय है 🙏🙏🙏
ReplyDeleteयुवा वर्ग जुडेगा कैंसे इस पर ध्यान आक्रशित करने की बहुत आवश्यकता है अभी हम ये प्रक्रिया फ़ेसबुक से सीख सकते हैं जैंसे फेसबुक मे दोस्तों की कतार बढती जाती है हमारा दोस्त उसका दूसरी दोस्त उस दोस्त का दोस्त एंसे ही चेन बनानी होगी तब ही हमारा संगठन डोर टू डोर कनेक्ट होगा 💐🙏🏻
ReplyDeleteHum sab ka pura support h es sangthan ko🙏❤🙏
ReplyDeleteबहुत ही उत्तम बात कही है🙏💐
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