Friday, 21 May 2021

कुछ प्रश्न हैं जो उत्तराखण्ड वासियों के हक के लिए उठे हैं




कुछ प्रश्न हैं जो उत्तराखण्ड वासियों के हक के लिए उठे हैं


👉 अत्यधिक मीठा बनकर रहने के कारण ही उत्तराखण्डियों को उनके हकों से वंचित रखा जाता है


👉 राजनैतिक मर्यादा "जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी" के फार्मूले पर भी हक़ से वंचित हैं उत्तराखंडी


👉 दिल्ली में 35 लाख की आबादी पर "शून्य" प्रतिनिधित्व पर हैं उत्तराखंडी


जब कभी अन्य सामाजिक व्यक्तियों द्वारा राजनैतिक हिस्सेदारी पर ये प्रश्न किया जाता है कि क्या "उत्तराखंडी" विधायक, सांसद बनकर ही उत्तराखण्डियों का भला हो सकता है, तो उत्तराखंड में क्यों नहीं हुआ ? अमूमन ये प्रश्न दिल्ली के परिपेक्ष में उत्तराखण्डियों की राजनैतिक हिस्सेदारी को ले कर किया जाता हैं। गौरतलब है कि दिल्ली में उत्तराखण्डियों की राजनैतिक हिस्सेदारी का बिगुल दिल्ली में भी अब बड़े ही शौर्य के साथ उत्तराखंडी समाज द्वारा फुका जा रहा है। इतिहास में ये प्रश्न अग्रेजों द्वारा भी कभी गांधी एवं अन्य राष्ट्रीय नेताओं से पूछा गया था। जो प्रश्न अंग्रेजी राज को एक दम सटीक लगता था बाद में उनका सटीक सवाल अंग्रेजों पर ही भारी पड़ गया। सटीक प्रश्न का सटीक उत्तर तो ये था कि राजनैतिक मर्यादा ये कहती है "जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी"। हम (उत्तराखंडी समाज) राजनैतिक मर्यादा के भीतर ही अपना हक़ मांग रहे हैं। उत्तराखंडी समाज राष्ट्र का वो पुत्र हैं जो मध्य में खड़ा सब देख रहा है कि क्षेत्र के नाम पर, प्रांत के नाम पर, जाती के नाम पर, धर्म के नाम पर सबको कुछ न कुछ मिला किन्तु उत्तराखंडी समाज को नहीं, क्योंकि उसने कभी इन आधारों पर मांग ही नहीं की और मांग उसने इसलिए नहीं की क्योंकि उत्तराखंडी की समझ अनंत है।

आज उत्तराखंडी समाज एक सच के मध्य में खड़ा है और वो सच हैं 35 लाख की आबादी पर शून्य प्रतिनिधित्व। वास्तव में अंग्रेजों के प्रश्न का सही उत्तर तो ये था कि तुम कौन हो हमारी सीमा तय करने वाले देश हमारा, लोग हमारे, शक्ति हमारी तो राज भी हमारा हमें अपने हालात कैसे संभालने है ये हम पर छोड़ दो, और चले जाओ हमारा देश छोड़ कर।

एक निवेदन है आप उत्तराखंडी समाज के स्वघोषित प्रतिनिधियों से कि अगली बार जब ये प्रश्न आपके सामने आए तो इस बार प्रश्न पर चुप मत रहिएगा, सवाल पर सवाल और सम्पूर्ण सवालों का एक ही उत्तर को समझिए और अपना लक्ष्य भेधी अचूक उत्तर दीजिए। वास्तव में प्रश्न के पीछे ये बोखलाहट हैं कि कहीं कुर्सी न खिसक जाय। आपसे ये प्रश्न लगातार और बार - बार किया जाएगा, आपसे पूछा जाएगा और आपके प्रतिनिधित्व की आवाज को दबाने का प्रयास भी होगा। किन्तु आप हिमालय की तरह अडिग रहना, किंचित भी मत घबराना, अभय होकर आगे बढ़ना और तब तक हार मत मानना जब तक अपना वजूद राजनैतिक पृष्ठिभूमि पर न बना दो। एक बात हमेशा याद रखिए

कर्म की वेदी में खून पसीने का अर्ग ही राजनीति की प्रचंड अग्नि को प्रदर्शित करेगा।


#उत्तराखंड गढ़ कुमाऊँ क्षेत्रीय संगठन 

     सुनील बरमोला

5 comments:

  1. एक नई सोच के साथ उत्तराखंड के युवाओं आगे बढ़ना होगा

    ReplyDelete
  2. नई चेतना का उदय होने जा रहा है, याद रहे हम सबको सबका साथ देना ही होगा।

    जय भूमिया
    जय देवभूमि

    ReplyDelete
  3. जय भारत जय उत्तराखण्ड आइए हम सभी इस संगठन से जुडें

    ReplyDelete
  4. जय भारत जय उत्तराखण्ड आइए हम सभी इस संगठन से जुडें

    ReplyDelete

उत्तराखण्ड में भू कानून की आड़ में क्या चल रहा है खेल

बिना दाँत के व्यक्ति को अगर गन्ना चूसने के लिए दे दिया जाए तो उसकी हालत शायद वैसी ही होगी जैसे कमजोर भू-क़ानून के साथ किसी राज्य की होती है,...