दृढ़-निश्चयी माधो सिंह भंडारी उर्फ माधो सिंह मलेथा की कहानी हर उत्तराखंडी को पता होनी चाहिए। क्योंकि यह उस शौर्य, वीरता, बलिदान की कहानी है जिसने मातृभूमि के लिए अपने स्वार्थ से ऊपर उठाकर सोचने की सीख दी।
400 साल से भी पहले हुआ था जन्म
माधो सिंह भंडारी का जन्म लगभग 1595 के आसपास बताया जाता है। उत्तराखंड के टिहरी जिले के मलेथा गांव में इन्होंने जन्म लिया था। बचपन से ही भंडारी जी बुद्धिमान और वीर थे, इसीलिए कम उम्र में ही गढ़वाल नरेश की सेना में वह सैनिक बन गए थे। लेकिन इनकी बुद्धिमानी और वीरता से ज्यादा इनके त्याग और अपनी भूमि के प्रति बलिदान की भावना को सबसे ऊपर रखा जाए तो गलत नहीं होगा। भंडारी जी एक बार जब अवकाश के दौरान अपने गांव मलेथा आए तो उन्होंने देखा कि गांव के खेत पानी की कमी के कारण सूखे पड़े हैं। उनके मन में लगातार यह बात चलने लगी कि आखिर अपनी धरती माता को हरा भरा बनाने के लिए पानी कहां से लाया जाए। फिर उनके मन में ख्याल आया कि गांव से कुछ दूर चन्द्रभागा नदी बहती है। उसका पानी गांव में लाया जा सकता है। हालांकि गांव के लोगों को यह बात जमी नहीं उन्होंने इसे असंभव कार्य बताया, क्योंकि नदी और गांव के मध्य बड़े पहाड़ और चट्टानें थीं। लेकिन माधा सिंह भंडारी जी ने ठान लिया था कि, इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है।
भंडारी जी ने पहाड़ का सीना चीरकर सुरंग बनाने की बात मन में बिठा ली। आप सब जानते हैं कि तब इतने आधुनिक औजर भी नहीं थे कि इस काम को आसानी से संभव किया जाता। आज भी यदि हम पहाड़ को काटने की बात करें तो लोग हंसी ही ज्यादा उड़ाएंगे। हालांकि माधो सिंह भंडारी जी पर लोगों की बात का कोई असर नहीं पड़ा उन्होंने अकेले ही सुरंग खोदने का काम शुरू कर दिया। इसके बाद धीरे-धीरे लोग उनके साथ जुड़ने लगे और अंत में जीत उनकी हुई और लंबे संघर्ष के बाद सुरंग बनकर तैयार हो गयी।
बलिदान के अद्वितीय गाथा
इसके बाद सबसे बड़ी समस्या आयी पानी को सुरंग के रास्ते गांव की भूमि तक लाने में। कई प्रयासों के बाद भी सुरंग में पानी नहीं आ पा रहा था। लोक कथाओं के अनुसार एक दिन माधो सिंह जी के सपने में उनकी कुलदेवी आयीं और कहा कि, नदी का पानी तब ही सुरंग के रास्ते गांव तक पहुंचेगा जब वह अपने एकमात्र पुत्र की बलि देंगे। यह बात सुनकर ही माधो सिंह विचलित हो गए। हालांकि उनके पुत्र गजे सिंह ने कहा कि आप मेरी बलि दे दें। आखिर में माधो सिंह ने अपनी धरती मां को हराभरा बनाने के लिए अपने एकमात्र पुत्र की बलि दे दी। इसके बाद नदी का पानी गांव के खेतों में पहुंच गया। आज भी माधो सिंह को मलेथा गांव के लोग भगवान की तरह पूजते हैं। ऐसा होना भी चाहिए। उनके इस बलिदान से आज पूरा मलेथा गांव हरा भरा है।
आज भी इस सुरंग के पानी से मलेथा गांव के 110 एकड़ में फैले खेतों की सिंचाई होती है। इस पानी की ही बदौलत 275 परिवार खुशहाली से जीवन बिताते हैं। कहा जाता है कि आज तक पानी को लेकर इस गांव में कोई विवाद नहीं हुआ।
अब हर उत्तराखंडी को जागने की जरूरत है
यह कहानी हम पहाड़ियों को यह सीख देती है कि, हम पहाड़ का सीना चीरने की हिम्मत भी रखते हैं। हम सबको मिलकर अब अपना भाग्य खुद बनाना होगा। तेरा-मेरा, अपना-पराया के फेर में फंसकर हमारे उत्तराखंड का नाश होगा और कुछ नहीं। अपने स्वार्थों को भूलाकर हमको भी सबसे पहले अपने राज्य की चिंता करनी होगी। कहते हैं कि, गांव में पानी पहुंचाकर माधो सिंह भंडारी वापस कभी अपने गांव नहीं लौटे थे। कारण उनके एकमात्र पुत्र की बलि उनके द्वारा चढ़ाया जाना हो सकता है, पुत्र की यादों से दूर रहने के लिए शायद उसके बाद वो कभी न लौटे हों। लेकिन वह अपनी धरती को वह सबकुछ देकर गए जिसकी उनकी धरती को जरूरत थी। आज उत्तराखंड के लोग कहते हैं कि, इस धरती पर कुछ नहीं है वास्तव में सच्चाई यह है कि इस धरती में सबकुछ है हम ही पंगु बने बैठे हैं। जनचेतना को जगाने के लिए अपने नफे-नुकसान से ऊपर सोचना जिस दिन हम सीख जाएंगे उस दिन यह देवभूमि सही मायनों में देवभूमि बन जाएगी।
शानदार..... 🙏🙏
ReplyDeleteआज भी एक आधुनिक सोच के साथ हर युवा वर्ग की स्वर्णिम उत्तराखंड में भागेदारी बहुत जरूरी हैँ.🌹🌹
हमारे संगठन को भी दृढ संकल्प के साथ आगे बढ़ने की ज़रूरत है💐🙏🏻
ReplyDeleteअखंड संकल्प के साथ आगे बढ़ते चलेंगे जी बस कुछ कर गुजरने की ठानी है।
ReplyDeleteबिल्कुल गौरव जी।
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