Tuesday, 25 May 2021

उत्तराखंड में गांवों से अधिक NGO फिर भी विकास को नहीं मिल रही गति, क्यों?



ये शब्द सभी ने सुना होगा? यदि हम बात करें कि ये NGO होता क्या है? तो सबके मन में यही प्रश्न आता है कि ये कोई संस्था है जो सामाजिक उत्थान के लिए कार्य करती है। 

चलो आज आपको NGO का सही अर्थ बताते हैं-

NGO का अंग्रेजी अर्थ होता है- 

N- NON नॉन, G- GOVERNMENT गॉवरमेन्ट, O- ORGANIZATION ऑर्गनाइजेशन अर्थात् बिना सरकार की सहायता से चलने वाला संगठन।

NGO को हम तीन वर्ग में विभाजित करते हैं-

  1. Trust Act

  2.  Society Act

  3. Companies Act

यह संगठन विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक कार्य करते हैं। वह कार्य इस प्रकार से है-  समाज में किसी भी प्रकार की सहायता जैसे विधवा महिलाओं के लिए आवास की व्यवस्था, गरीब अनाथ बच्चों को पढ़ाना, महिलाओं की सुरक्षा, जलाशयों को सुरक्षित रखना, बीमारी के रोकथाम के लिए कार्य करना गौ-पालन एवं शहरी व ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए NGO कार्य करती है।

अब आप समझ चुके होंगे कि NGO का मतलब होता क्या है। और वर्तमान में इन NGO की उत्तराखण्ड में क्या भूमिका है?

सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में 16,674 गाँव है और गैर-सरकारी संगठन मतलब  NGO की संख्या 51,765 का आंकड़ा अभी तक पंजीकृत हो चुका है, यह आंकड़ा बहुत ही चौंकाने वाला है, लेकिन यह सतप्रतिशत सत्य है। अब आप खुद से गणित करोगे तो पाओगे कि औसतन प्रत्येक ग्रामसभा में तीन-चार एनजीओ कार्य कर रहे हैं। इनमें भी 60 प्रतिशत से अधिक का कार्यक्षेत्र ग्रामीण विकास पर केन्द्रित है, जिनको केवल ग्राम सभाओं पर ध्यान देना है जैंसे स्कूली शिक्षा को बढ़ाना, छोटे-छोटे लघु उद्योग या कुटीर उद्योगों को खोलना, पौराणिक जल स्रोतो को सुव्यवस्थित करना इत्यादि। यदि हम एक आंकड़े की माने तो अब तक प्रत्येक गाँव की दिशा और दशा बदल गई होगी? मगर साथियों वास्तव में सच्चाई किसी से छिपी नही है और आज भी पहाड़ों की दुर्दशा, पहाड़ों में सुविधा का अभाव देखने को मिलता है,  विशेष रूप से गाँव-कस्बों से पलायन होता युवा वर्ग थम नही रहा है।

उत्तराखण्ड में एनजीओ के सैलाब ने एक उद्योग का आकार ले लिया है। केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें तक इन एनजीओ को खूब बजट दे रही हैं। ग्राम्य विकास, पर्यावरण, महिला उत्थान, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार, स्थानीय संसाधनो का बेहतर उपयोग समेत तमाम अहम मसलों पर जो कार्य सरकारी महकमें कर सकते थे, वो सभी कार्य आज इन एनजीओ के माध्यम से किये जा रहे हैं ताकि कुछ अच्छा परिणाम सामने आए। परन्तु सच में किस प्रकार से धरातल पर कोई कार्य एनजीओ द्वारा किया गया हो तो वह उंगलियों में गिनने लायक ही खरे उतरे हैं।

इस प्रकार की दुर्दशा ने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि औसतन तीन एनजीओ यदि उत्तराखण्ड के एक-एक गाँव पर कार्य को केन्द्रित करते तो कब की गाँवों की दिशा और दशा बदल चुकी होती। खैर अब आगे देखते हैं कि, शासन किस प्रकार से इन सभी पर नकेल कसती है परन्तु इस प्रश्न का उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है।

एक नजर डालते हैं कहाँ पर कितने एनजीओ सक्रिय हैं

जिला एनजीओ की संख्या

देहरादून 12,163

पौड़ी 6,187

हरिद्वार 6,053

अल्मोड़ा 5,026

टिहरी 4,841

ऊधमसिंहनगर 4,202

चमोली 3,297

पिथौरागढ़ 2,943

उत्तरकाशी 2,087

नैनीताल 1,942

रुद्रप्रयाग 1,359

चंपावत 904

बागेश्वर 671

अब आप स्वयं से या आस-पास से जरूर पता कर लें कि कौन सा एनजीओ हमारे आस-पास कार्य कर रहा है जिसकी हमें खबर तक नही लग पाई।

धन्यवाद।।


5 comments:

  1. Itna kuch ho rha h Or hum logo ko kuch pta v nahi h , humare naam pe paise kha re h

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  2. आने वाले कुछ वर्षों उत्तराखंड के पहाड़ी छेत्रो मे इंसान कम और Ngo ज्यादा हो जाएंगे! क्यूंकि उत्तराखंड के युवा कुम्भकरण की नींद सो रहें हैँ, और लंका पतन होने वाली हैँ.. 🤔🤔 युवा वर्ग अगर युवा सोच के साथ स्वर्णिम उत्तराखंड के लिए आगे आएगा तो शायद इंसानो के साथ गाँव - गाँव मे खुशियों का सैलाब भी आएगा.🌷🌷

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  3. जी बिमल सही कहा आपने यही होगा आने वाले समय मैं।🙏💐💐🙏

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  4. अगर सरकार मूलभूत समस्यों के निवारण करने में सक्षम होती ।। तो शायद आज NGO की जरूरत ही नही होती।

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  5. उत्तराखंड में ngoका तात्पर्य केवल पैसा लूटना है, यही कारण है कि दिन प्रतिदिन उत्तराखंड में NGO की तादाद बढ़ती जा रही है

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