देश के सत्ताईसवें राज्य उत्तराखंड को प्रकृति ने बहुत खूबसूरती प्रदान की है। खूबसूरती के साथ ही कई बहुमूल्य औषधियां, पर्यटन स्थल, धार्मिक स्थल भी इस राज्य में हैं, जिनके बारे में शायद राज्य के रहवासियों से ज्यादा बाहर के लोग जानते हैं। कहने का तात्पर्य है कि, 'कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि'। जिस जिंदगी को तलाशने इस राज्य के बाशिंदे पलायन कर जाते हैं, जिंदगी का वह मर्म इस राज्य से ज्यादा बहुत कम ही कहीं देखने को मिलेगा।
इजरायल से बहुत कुछ सीख सकता है उत्तराखंड
आप लोग इजरायल देश का नाम तो जानते होंगे। एक ऐसा देश जो चारों ओर से दुश्मनों से घिरा है, जिसके बाशिंदे यानी यहूदियों को हिटलर ने गैसे चैंबर में डालकर लाखों की संख्या में मारा था। 1948 से पहले जिनके अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा था, उन्होंने आज एक विकसित देश का निर्माण कर दिया। इस देश ने 6 दिनों में इजरायल के 6 देशों को जंग में धूल चटा दी थी। लेकिन आज हम इस देश की युद्ध नीति की नहीं बल्कि इस बात की चर्चा करते हैं कि यह देश जो 1948 से पहले अस्तित्व में नहीं था, जिसकी आबादी आज भी उत्तराखंड से कम है, जिसके पास इनती जमीन भी नहीं है जितनी उत्तराखंड के पास वो इतना जल्दी इतना विकसित हुआ कैसे। हालांकि एक राज्य और देश के बीच तुलना करना बहुत वाजिब बात नहीं लेकिन, सीख लेने के लिए हर रास्ता खुला रहता है।
छोटे से देश के बड़े कारनामे
तो, आज इजरायल तकनीक के मामले में 5 सबसे शक्तिशाली देशों में है। इस देश का जब निर्माण हुआ तो इसके निर्माताओं को पता था कि, हमारे पास न इतनी जमीन है कि जिसे उपजाऊ बनाकर हम पैसा कमाएं, न इतनी प्राकृतिक सुंदरता कि टूरिज्म को बढ़ावा दें, न तेल के कुएं..कुलमिलाकर देखें तो कुछ भी ऐसा नहीं जिससे वो प्राकृतिक रूप से पैसा बना पाते। लेकिन यह सोचकर वह माथा पकड़कर रोने नहीं लगे। उन्हें पता था कि हम तकनीकी मामलों में अपनी पकड़ बनाकर दुनिया में अपनी पहचान बना सकते हैं।
इजरायल ने टेक्नॉलजी पर तन-मन-धन से ध्यान दिया। आपको हैरानी होगी उन्होंने अपने तकनीक को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने के लिए एक संस्था का ही निर्माण कर दिया जिसका नाम है, टेक ट्रांसफर ऑर्गनाइजेशन(TTO)। इस संस्था का निर्माण इसलिए हुआ कि यदि सरकार सामान बेचने में कामयाब न हो, वैज्ञानिक बेचने में कामयाब न हो तो इस संस्था के लोग दूसरे देशों तक पहुंचकर उस तकनीक या सामना को बेचें। हालांकि इसके लिए उन्होंने पहले अपने देश में मौजुद थोड़े बहुत संसाधनों को तकनीक को मजबूत करने के लिए ढूंढा और उसके बाद उसे इस्तेमाल में लाए।
विकास करने की भावना की कमी
अब उत्तराखंड पर आ जाते हैं, यहां राजनीति से बढ़कर कुछ नहीं है। राजनीति, सत्ता तो दिला सकती है पर एक राज्य और देश के हर व्यक्ति को रोजगार नहीं। किसी भी देश या राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए सबसे पहली आवश्यकता है भावना। अगर उत्तराखंड के लोग भी अपने, संसाधनों अपनी ताकत को पहचानते तो, युवा अवस्था में पहुंच चुका यह राज्य देश का सिरमौर हो सकता था। राजनेता चाहते तो जैसे इजरायल ने TTO का निर्माण अपनी संसाधनों को बेचने के लिए किया वैसी ही संस्था का निर्माण उत्तराखंड में मौजूद वनस्पतियों, औषधियों की खोज के लिए बनायी जाती। जो न केवल वनस्पति और औषधी को खोजती बल्कि उनके अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल को लेकर शोध कार्य करवाती। ऐसा करके न जाने कितने युवाओं को सरकार रोजगार दे सकती थी।
खैर राज्य के प्रति राज्य के बाशिंदों का ही लगाव आज बहुत कम देखने को मिलता है, तो राजनेताओं के तो क्या ही कहने। हालांकि गलति युवाओं की भी नहीं है, संसाधनों के अभाव में राज्य से बाहर गया युवा, उस तरह से उत्तराखंड के प्रति जुड़ाव महसूस नहीं करता जैसा होना चाहिए। इसमें सरकार की नाकामी तो है, लेकिन सारा ठीकरा नताओं पर फोड़ देने से होना कुछ है नहीं।
तो नाकामी क्या है, और किसकी है?
तो नाकामी क्या है, और किसकी है? नाकामी के बिंदुओं पर बात करने से अच्छा एक उदाहरण आपको दिया जाए। उत्तराखंड के जंगलों में कड़ी पत्ता भारी संख्या में होता है, इस कड़ी पत्ते को करी पत्ता, गंधेला और उत्तराखंड की स्थानीय बोलियों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इस कड़ी पत्ते की कीमत 1000 रूपये प्रतिकिलो से भी ज्यादा है। अब राज्य के लोग अगर चाहते, या सरकार की नीयत होती तो इस कड़ी पत्ते की खेती से ही कई लोगों का पेट पाला जा सकता था। इस कड़ी पत्ते पर शोध करके, इसका कई तरह प्रयोग करने के बारे में हम दुनिया को बता सकते थे। जैसा कि इजरायल अपनी तकनीक को विकसित करके पूरी दुनिया में उसका प्रचार करता है। इस छोटे से पौधे से भी राज्य की जनता को और सरकार को भी फायदा पहुंच सकता था।
खैर हम तो अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना ज्यादा पसंद करते हैं। जब इन संसाधनों को बाहर से आए लोग इस्तेमाल करेंगे और धनासेठ बन जाएंगे तब हमें होश आएगा। तो ऐसी ही कई नाकामियों की कहानियां, यही नाकमी है और नाकामी हमारी ही है। अगर हम अभी भी नहीं चेते तो नाकामी की कहानियां आने वाले समय में उत्तराखंड के लोगों से सुनी जा सकती हैं, जब दूसरे लोग हमारी धरती पर आकर हमें बताएंगे कि, देखिये यह पौधा इतने काम का था और इतने तरीकों से अन्य कामों में भी लाया जा सकता है। उत्तराखंडी लोग तब कहेंगे कि, यह तो हमें भी पता था लेकिन समय पर सुध नहीं आयी हमें। तो बिंदुवार नाकामियों को समझाना बेवकूफी ही होगी, जिसको समझना है उसके लिए इशारा ही काफी है।
अब खुद को पहचानने का वक्त
अब समझना आम नागरिकों को है कि, उत्तराखंड को अब राजनीति नहीं, वह सोच चाहिए जो इस राज्य का भविष्य सुधार सके। ऐस राजनीतिज्ञ चाहिए जो बैंक बैलेंस से ज्यादा राज्य को विकसित करने के लिए बौद्धिक धन का इस्तेमाल करें। एक प्रार्थना यह है कि, कोई भी उत्तराखंडी अब कम-से-कम यह कहना बंद कर दे कि, आखिर उत्तराखंड में क्या है? पहाड़ी राज्य होने के कारण यहां का विकास होना मुश्किल है? हां, इसके बदले आप बोल सकते हैं कि, हमारे बस का नहीं है, हमें मेहनत नहीं करनी। धन्यवाद............



आइए हम सभी उत्तराखण्ड के विकास में भागीदार बनें
ReplyDeleteअगर हम कोई भी उत्तराखंड के बारे में सोचते है या कहते है तो हमे जरूर करना चाहिए वैसे जब से उत्तरांचल से उत्तराखंड बना तब से उसका पतन होता गया
ReplyDeleteसही कहा आपने यह एक छोटा सा राज्य जो देवभूमि के नाम से विख्यात है यह उत्तर दिशा में हिमालय पर्वत के आंचल में बसा एक
Deleteउत्तरांचल था जिसे बाद में कुछ राजनीतिक कारणों से उत्तराखंड कर दिया गया
आइए हम सभी उत्तराखंड कुमाऊं क्षेत्रीय संगठन के साथ मिलकर उत्तराखंड के विकास में अपना सहयोग दें
ReplyDeleteवर्तमान में परिवर्तन उत्तराखंड की प्राथमिक मांग है चाहे वो मानसिक हो
ReplyDeleteया सामाजिक हो। आज हमें उस विचारधारा बदलने की जरूरत है जो उत्तराखंड से पिछले 20 सालों से खिलवाड़ करती आ रही है।
Hmara uttrakhand bhi saf sundar or birojgar se mukat ho uttrakhand ko searg kha jaye yha koyi bhi bimar or berojgar na rhe
ReplyDeleteउसके लिए आप सभी को आगे आना पड़ेगा महोदय जी 💐🙏🏻
Deleteउत्तराखंड राज्य को जिस सोच के साथ बनाया था कि एक अलग राज्य बनेगा तो यहाँ के वासियों का विकास होगा तो राज्य का भी विकास होगा लेकिन सरकार ने तो कुछ और ही सोच रखा था। कि सरकार को कहा से ज्यादा राजस्व मिल सकता हैं। तो सरकार ने डैम बनाने चालू कर दिये। और जो गाँव वाले अपने पैतृक जमीन पर खेती करते थे, कि इससे आपको रोजगार मिलेगा उनको भी विश्वास में लेकर रोजगार तो दिया या ना दिया इसबारे में तो सरकार हम से अच्छा जानती है। अगर कोई स्वरोजगार करने की सोच से अपने खेतों में गिलोय तुलसी एलोविरा जैसे रोग प्रतिरोधी औषधि जैसे कई प्रकार की वनस्पतियां जो कि हम सब जानते कि आज कल इसकी बाजार में बहुत मांग है सरकार को इस प्रकार व्यवस्था करनी चाहिए कि जो लोग इस व्यसाय से जुड़े और अपने ही गाँव मे स्वरोजगार करने को तैयार हैं।
ReplyDeleteतो सरकार इसकी व्यवस्था करनी चाहें कि उनको निर्यात करने में कोई दिक्कत न हो। जैसे आपने अपने विचार से इजरायल का उदाहरण दिया किस प्रकार वाह की सरकार ने TTO का निर्माण अपनी संसाधनों को बेचने के लिए किया वैसी ही संस्था का निर्माण उत्तराखंड में मौजूद वनस्पतियों, औषधियों की खोज के लिए बनायी जाती। जो न केवल वनस्पति और औषधी को खोजती बल्कि उनके अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल को लेकर शोध कार्य करवाती। ऐसा करके से संसाधनो का तो इस्तमाल होता साथ में न जाने कितने युवाओं को सरकार रोजगार दे सकती थी।
इसमें पढ़े लिखे लोगों को ही आगे आना पड़ेगा जिससे कि पहाड़ में परिवर्तन हो सके।
ReplyDelete🙏
इसमें पढ़े लिखे लोगों को ही आगे आना पड़ेगा जिससे कि पहाड़ में परिवर्तन हो सके।
ReplyDelete🙏