'मिल जाती है दौलत, मिल जाती है शोहरत भी”
बदले में सुकून दिल को नहीं मिलता।।
दूरदर्शन के जमाने में आने वाले एक धारावाहिक की यह लाइनें याद आ गयीं। क्यों? क्योंकि जिस सुकून के लिए उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड राज्य का निर्माण हुआ था वह अभी तक इस राज्य के वासियों को नहीं मिला। दौलत, शोहरत के लिए प्रदेशवासी दूसरे राज्यों में गए, जिससे न पहाड़ों को उतना सुकून मिला न पहाड़ के निवासियों को।
प्राकृतिक अपदाओं का कारण भौतिकवाद
प्राकृतिक आपदाओं ने राज्य के बनने के बाद से विकराल रूप धारण किया और कई हादसे इस राज्य ने सहे। इन आपदाओं के लिए प्रकृति पर सवाल उठाना सही नहीं है, नाकामी हमारी ही है। हमने भौतिकवाद को इतना बढावा दिया है कि प्रकृति हमारी नजरों में गौण हो गई। प्रकृति बस रौद्र रूप धारण करके हमें चेताने का काम करती है कि हम अपने स्वार्थ से उठकर काम करना सीखें।
पलायन पर कब होगा प्रहार?
उत्तराखंड के मशहूर पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट की बात याद करें तो उन्होंने कहा था कि, ' उन्हें बता दो कि हम एक भी पेड़ को गिरने नहीं देंगे, जब उनके हाथ कुल्हाड़ी उठाएंगे, तब हम पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें गले से लगा लेंगे'। यह जज्बा इस राज्य के बनने के बाद हर उत्तराखंडवासी के मन में होना चाहिए था। लेकिन हुआ क्या, जिस पलायन को रोकने की आवाज उठाई गई थी उस आवाज को हमने अपने स्वार्थ के लिए ही कुचल दिया। 2011 के जनसंख्या आंकड़ों की बात करें तो उस समय उत्तराखंड के 17 हज़ार गाँवों में से लगभग एक हजार के करीब गांव पूरी तरह से खाली हो चुके थे। वहीं 300 से भी अधिक ऐसे गांव थे जहां गांव में लोगों की संख्या 10 से भी कम थी।
उत्तराखंड की सरकारों द्वारा किये गए वादों की धज्जियां तो राज्य के बनने के बाद से ही उड़नी शुरू हो गयी थी, पलायन के जिस भूत की लंगोट पकड़कर राज्य का निर्माण हुआ था वह भूत राज्य के बनने के बाद भी सता रहा है। लेकिन 2020 में जब कोरोना ने देश के शहरों में आतंक मचाया तो, पलायन उल्टी गति से शुरू हुआ। शहरों में रह रहे उत्तराखंडवासी घरों को लौटने लगे तो सरकार उसके लिए भी उतनी तैयार नहीं दिखी।
देवप्रयाग की घटना
खैर, वापस प्राकृतिक आपदाओं की ओर मुड़ें तो केदारनाथ जैसी बड़ी प्रलयकारी बाढ़ भले ही रोज न आ रही हो लेकिन छोटे-छोटे हादसे राज्य में लगातार हो रहे हैं। हाल ही में देवप्रयाग में आयी मूसलाधार बारिश ने 10 दुकानों और आईटीआई भवन को ध्वस्त कर दिया। इस बारिश के कारण जान की हानि तो नहीं हुई लेकिन इस मूसलाधार बारिश ने संपत्ति का नुकसान तो किया ही है। ऐसी ही कई छोटी-छोटी घटनाएं उत्तराखंड में अक्सर घटती रहती हैं।
तो सवाल यही है कि, क्या सरकारों को इन बातों की जानकारी नहीं है कि, यह एक पर्वतीय राज्य है और यहां बारिश से कितना नुकसान हो सकता है। आप पर्वतीय राज्यों की बात करें तो हमारा पड़ोसी राज्य हिमाचल इन आपदाओं की चपेट में बहुत कम आता है। कारण यह नहीं है कि वहां बारिश नहीं होती या वहां पहाड़ मजबूत हैं, जो कई बार सुनने को मिलता है। कारण यह है कि वहां रोजगार के साधन सरकार ने पैदा किये हैं, इसी कारण वहां के लोग भी अपने राज्य से जुड़े हैं और उत्तराखंड की तुलना में पलायन की गति बहुत कम है।
सत्तासीन लें जिम्मेदारी
हालांकि सरकार तो इस ज़िम्मेदारी से दूर भागने का प्रयास कर रही है इसलिए अब उत्तराखंड के लोगों को जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने की आवश्यकता है। गढ़वाली-कुमाऊंनी गीत सुनकर पहाड़ों के प्रति अपने लगाव को दिखाने की बजाय यदि हम इस राज्य के लिए कुछ सोचते तो शायद आज विकास की राह पर यह राज्य चल रहा होता। हम उत्तराखंडवासियों ने ही राज्य के साथ सौतेला व्यवहार किया है। यह बात हमें समझ लेनी चाहिए कि सत्ता में राजनीति होती है। नेता सत्ता बचाने के लिए ज्यादा और अपनी आत्मा से काम कम करते हैं। अब राज्य का उद्धार तब हो सकता है जब राजनीति में उत्तराखंड की आत्मा को तथा वंहा के मर्म को समझने वाले लोग त्ता अपने हाथों में लेने का फैसला करेंगे या जनता अपने बलबूते पर कुछ करने की ठान लें। अब समय आ गया है कि, आम जनमानस को यह समझने की जरूरत है कि उत्तराखण्ड राज्य का विकास उसी तरह से हो सकता है जैसे अन्य राज्यों का हो रहा है।
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निष्कर्ष
दौलत, शोहरत से ज्यादा आज भी सुकून मिलना जरूरी है। कोरोना ने कई लोगों को तो आईना दिखा ही दिया कि, अपने घर में जो सुकून है वह सुकून कहीं नहीं मिल सकता। तो हम पहाड़ी अब समझें कि अपनी जान बचाने के लिए हम उत्तराखंड न आएं अपितु यह ठान लें कि अब यह माटी ही हमे सहारा देगी और हमें इसको सहेजकर एक ऐसा राज्य बनाना है जिसे केंद्र सरकार विशेष राज्य का दर्जा न दे अपितु पूरी दुनिया में यह अपने विकास के लिए जाना जाए।
धन्यवाद💐
💐🙏🏻उत्तराखण्ड गढकुमाऊँ क्षेत्रीय संगठन🙏🏻💐
बहुत ही उत्तम विचार। 💐🙏🏻 आइए हम सब इस मुहीम से जुडें.......💐
ReplyDeleteउत्तराखंड में केवल भोले भाले लोगों को एक मोहरा बनाकर उत्तराखंड का शोषण हो रहा है
ReplyDeleteउत्तम विचार
ReplyDeleteयुवाओं का सहयोग ही जरूरी है उत्तराखंड गढकुमाऊ क्षेत्रीय संगठन को बहुत ही उत्तम विचार🙏💐💐🙏
ReplyDeleteउत्तराखंड के युवाओं का सहयोग और ग्रामीण क्षेत्रों का सहयोग मिलेगा तो संगठन के कार्यकर्ताओं
ReplyDeleteको कार्य करने का उत्साह बढ़ेगा।
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