Thursday, 22 July 2021

उत्तराखण्ड में भू कानून की आड़ में क्या चल रहा है खेल



बिना दाँत के व्यक्ति को अगर गन्ना चूसने के लिए दे दिया जाए तो उसकी हालत शायद वैसी ही होगी जैसे कमजोर भू-क़ानून के साथ किसी राज्य की होती है, मतलब राज्य के संसाधनों का आनंद लेने में स्वयं राज्य असमर्थ रहता है, किसी भी राज्य के लिए राज्य हितैषी भू-क़ानूनों की चर्चा एक भावुक विषय है और इन दिनों उत्तराखंड में भू-क़ानूनों की माँग यह दर्शता है कि राजनैतिक दल इस विषय पर हल्ला मचाकर दो-चार प्रतिशत मतों को 2022 के विधानसभा चुनावों में प्रभावित करने के इच्छुक हैं । 

मीडिया और सोशल मीडिया पर भू-क़ानून की माँग तो हो रही है परन्तु भू-क़ानूनों के स्वरूप पर चर्चा नहीं हो रही है, मतलब दवाई तो माँगी जा रही है परन्तु बीमारी नहीं बताई जा रही है , उत्तराखंड में भू-क़ानून तो आज भी हैं और बिना भू-क़ानूनों के राज्य की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती है , उत्तराखंड राजस्व विभाग की वेबसाइट पर जाकर क़ानून और नियमों की जानकारी भी ली जा सकती है । क़ानून पूर्ण रूप से सफल रहें ऐसा भी नहीं है वर्ना IPC की धारा 302 कत्ल होने से रुकवा देती, लेकिन किसी क़ानून की आड़ में अपराध होने लग जाएँ तो स्तिथि का दुर्भाग्यपूर्ण हो जाना लाज़मी है और तब क़ानूनों के अस्तित्व और उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह उठने लगते हैं , उत्तराखंड के भू-क़ानून भी आज सवालों के घेरे में हैं , मुझे लगता है कि इन भू-क़ानूनों की आड़ में ही भू-अपराध हो रहे हैं । 



सवाल यह उठता है कि पिछले बीस वर्षों में जिन लोगों को section 154 के तहत कृषि योग्य भूमि ख़रीदने की अनुमति मिली और section 143 के तहत जिन्होंने ख़रीदी गई भूमि का लैंड यूज बदलवा लिया क्या उन ज़मीनों पर section 143 की अनुमति लेने के समय प्रस्तावित व्यवसाय आरम्भ हो गये हैं ? अगर हाँ तो क्या इसकी कोई जाँच रिपोर्ट बनती है , क्या कोई ऐसा डाटा भी तैयार किया गया है कि उन व्यवसायों में कितने प्रतिशत उत्तराखंडियों को रोज़गार मिला और उत्तराखंड को कितने प्रतिशत राजस्व का फ़ायदा हुआ, अगर नहीं तो फिर क्यों नहीं उनके section 143 की अनुमति को रद्द कर दिया जाए ?  क्या section 154 के तहत ज़मीन ख़रीदने की अनुमति लेकर उत्तराखंड में कितनी भी ज़मीन ख़रीदकर और section 143 के तहत ज़मीन का लैंड यूज बदलवाकर उत्तराखंड की ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करना या करवाना ठीक है? हमें इन फ़र्ज़ी व्यवस्थाओं के ख़िलाफ़ भी क़ानूनों की माँग करनी चाहिए । 

सबसे हास्यास्पद क़ानून यह है कि एक व्यक्ति  केवल 250 मीटर कृषि योग्य भूमि ख़रीद सकता है और एक ही परिवार के चार सदस्य 250-250 मीटर की चार अलग-अलग रजिस्ट्री करवा सकते हैं , मतलब एक व्यक्ति सीधे तौर पर 1000 मीटर ज़मीन नहीं ख़रीद सकता परन्तु जुगाड़बाजी कर 1000 मीटर का मालिक बन सकता है ,मतलब हम क़ानून भी बना रहे हैं और क़ानून की धज्जियाँ उड़ाने का मंत्र भी साथ-साथ दे रहे हैं , क्या भविष्य में कभी ये भी देखा जाएगा कि 250-250 मीटर की अलग-अलग ज़मीनों का अलग-अलग उपयोग हो रहा है या नहीं? अगर नहीं तो हमें इन व्यवस्थाओं के विरूद्ध भी क़ानून की माँग करनी चाहिए । 



कई पढ़े-लिखे मित्रों कि शिकायत और सवाल है कि अगर हम उत्तराखंड में किसी को ज़मीन नहीं ख़रीदने देंगे तो हमें उत्तराखंड से बाहर ज़मीन ख़रीदने का क्या अधिकार है ? उन मित्रों को शायद बाहरी राज्यों के सशक्त भू-क़ानूनों के संदर्भ में ज्ञान कम है , मैं उन्हें चुनौती देता हूँ कि वो केवल नौयडा उत्तर-प्रदेश में एक इंच कृषि योग्य ज़मीन ख़रीदकर उसका section 143 के अंतर्गत लैंड यूज बदलवाकर दिखा दें या कोई ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर दें  जिन्होंने किसान से ज़मीन ख़रीदकर लैंड यूज बदलवा लिया हो बाक़ी राज्यों की बात तो बाद में करेंगे, ये उत्तराखंड ही है जिसपर ये कहावत सटीक बैठती है- अन्धेर नगरी चौपटराज। 

मौजूदा भू-क़ानूनों के दाँत घिस गये हैं या तोड़ दिये गये हैं , 154 और 143 की फ़ाइलें DM से राजस्व उप-निरीक्षक और राजस्व उपनिरीक्षक से DM तक दौड़ती हैं परन्तु जिनको  कोई काम नहीं करने उनके काम बन जाते हैं और जिन्हें हक़ीक़त में काम करना है उनके काम नहीं बनते, अक्सर यह देखा गया है कि 143 करवाकर बाहरी व्यक्ति द्वारा लंबी चौड़ी ज़मीन ख़रीदकर उसमें बाग और बंगला बना लिया जाता है फिर उस संपत्ति की  देखरेख करने के लिए बाबू और चौकीदार भी बाहरी रख दिया जाता है , पता नहीं 154 और 143 करवाते समय ये लोग अधिकारियों के सामने कौन सा मंत्र फूंकते है जो पढ़ा-लिखा अधिकारी अपनी आँखों को मूँदकर इनके पक्ष में आदेश पारित कर देता है ।

हीरा सिंह अधिकारी जी


Tuesday, 20 July 2021

भगवान शिव का प्रिय मास है श्रावण, जानें इसका कारण



द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरं। सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥



हरेला पर्व संक्रान्ति के आगमन (१६ जुलाई२०२१)के साथ ही उत्तराखंड में श्रावण का पवित्र महीना भी शुरु हो गया है। श्रावण मास में भगवान भोलेनाथ की आराधना करना बहुत ही पुण्यदायी और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। ''भगवान शिव'' को श्रावण का महीना बहुत प्रिय है क्योंकि वे इसी महीने अपनी शक्ति के साथ सायुज्य प्राप्त करते हुए समस्त सृष्टि का सर्जन करते हैं।



'शिव'- सर्वहारा वर्ग के संरक्षक देव-

भारतीय परम्परा में शिव परब्रह्म,परमात्मा,रुद्र,महादेव आदि विभिन्न नामों से जाने जाते हैं। 'शिव’ शब्द की एक व्याख्या के अनुसार अनन्त तापों से संतप्त होकर प्राणी जहाँ विश्राम हेतु शयन करते हैं अथवा प्रलय की अवस्था में जगत जिसमें शयन करता है उसे 'शिव’ कहते हैं - 'शेरते प्राणिनो यत्र स शिवः’ अथवा 'शेते जगदस्मिन्निति शिवः’  भगवान राम तथा कृष्ण का आविर्भाव क्रमशः त्रेता तथा द्वापर युग में होता है किन्तु शिव सृष्टि के आदिकाल से ही प्रत्येक युग में दीन-हीन, निर्बल,असहाय तथा सर्वहारा वर्ग के संरक्षक देव हैं।

शिव-शक्ति की कृपा का मास सावन-

भारतीय परम्परा में सावन का महीना अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह महीना पूरी तरह से भगवान शिव को समर्पित है। इस माह में विधिपूर्वक शिवजी की आराधना करने से मनुष्य को शुभ फल प्राप्त होते हैं। सावन के महीने की विशेष महिमा इसलिए भी है क्योंकि इस महीने में ही पार्वती जी ने शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी और शिव ने उन्हें इसी माह में दर्शन भी दिए थे। तभी से सावन माह को शिवजी की तपस्या और पूजा-पाठ और उनकी कृपा पाने के लिए विशेष शुभ माह माना जाने लगा है। पुराणों के अनुसार सावन में भगवान शंकर की पूजा, अभिषेक, मंत्र-जाप करने से कई गुणा फल प्राप्त होता है। खासकर सोमवार के दिन महादेव की आराधना से शिव और शक्ति दोनों प्रसन्न होते हैं। इनकी कृपा से मनुष्य को दैविक,दैहिक और भौतिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। निर्धन को धन, नि:संतान को संतान और कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर प्राप्त होता है।

क्यों प्रिय है शिव को श्रावण मास ?

भारत के समस्त उप-महाद्वीप के लिए कल्याणकारी श्रावण या सावन का महीना वैसे भी दक्षिण-पश्चिमी मानसून के आगमन से जुड़ा महीना होने के कारण कृषि और खेती-बाड़ी के लिए भी खास महीना है। धरती के उदर में सृष्टि के बीजों के अंकुरण होने के कारण इस महीने प्रकृति का कण-कण चारों ओर हरियाली से भरपूर रहता है। भगवान शिव को श्रावण मास सबसे प्रिय महीना इसलिए भी लगता है क्योंकि श्रावण मास में सबसे अधिक वर्षा होती है जो शिव के तपस्या से तप्त शरीर को शीतलता व आनन्द प्रदान करता है।


पौराणिक आख्यानों में भगवान शंकर ने स्वयं सनत कुमारों को सावन महीने की महिमा बताते हुए कहा है कि मेरे तीनों नेत्रों में सूर्य दाहिने, चन्द्रमा बाएँ और अग्नि मध्य नेत्र में  विराजमान हैं। भारतीय काल गणना में महीनों के नाम नक्षत्रों के आधार पर रखे गए हैं। जैसे वर्ष का पहला माह चैत्र होता है, जो चित्रा नक्षत्र के आधार पर पड़ा है, उसी प्रकार श्रावण महीना 'श्रवण' नक्षत्र के आधार पर रखा गया है। गौरतलब है कि श्रवण नक्षत्र का स्वामी भी चन्द्रमा है। चन्द्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है। जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है जिसका स्वामी चन्द्रमा है, तब श्रावण महीना प्रारम्भ होता है। यानी सूर्य गर्म है और वह शीतल ग्रह चन्द्रमा के घर में प्रवेश करता है इसलिए मौसम वैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य के कर्क राशि में आने से झमा-झम बारिश का मौसम बनने लगता है जिसके फलस्वरूप लोक-कल्याण के लिए विष को ग्रहण करने वाले देवों के देव महादेव और निरन्तर तपस्यारत देवाधिदेव शिव को चंद्रस्वरूपा व प्रकृतिरूपा पार्वती के संसर्ग से शीतलता और आनन्द की अनुभूति होती है। यही कारण है कि भगवान शिव को श्रावण मास से विशेष लगाव है। इस महीने शिव अपनी प्रकृति रूपा शक्ति पार्वती के साथ एकीभाव होकर मनुष्य के प्रति अपना कृपा-भाव प्रकट करने के लिए लोक-कल्याण हेतु तत्पर रहते हैं।

शिव व शक्ति के मिलन का महीना-

भारतीय ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य ग्रह उग्र और पिता का कारक ग्रह माना जाता है और शीतल प्रकृति का चंद्रमा मातृत्व का कारक ग्रह है। श्रावण मास इन दोनों के मिलन का मास है। समस्त सृष्टि के पिता भगवान शिव इसी श्रावण मास में मेघ का रूप धारण करके हिमसुता प्रकृति परमेश्वरी पार्वती के साथ विवाह रचाने हिमालय पर्वत में जाते हैं जिसकी वजह से मानसूनी वर्षा होती है और पृथ्वी रत्नगर्भा वसुंधरा का रूप धारण करती है। इसी वर्षा से धरती में नदियाँ वेग रूप से प्रवाहित होती हैं, वानस्पतिक संपदा और फल-फूल पैदा होते हैं, खेतों में अन्न उपजता है और समस्त प्राणियों का भरण-पोषण होता है। श्रावण के महीने का यही पर्यावरण वैज्ञानिक स्वरूप है। श्रावण आने से पहले प्रबोधनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता के सारे दायित्वों से मुक्त होकर अपने दिव्य भवन पाताल लोक में विश्राम करने के लिए गमन करते हैं और अपना सारा कार्यभार महादेव शिव को सौंप देते हैं। तब भगवान शिव ही पार्वती के साथ मिलकर इस श्रावण मास के दौरान पृथ्वी लोक में सृष्टि-सर्जन, लोक-धारण का दायित्व पूरा करते हैं। शिव और पार्वती जगत के माता-पिता के रूप में पृथ्वीवासियों के कष्टों को हरते हैं एवं उनकी मनोकामनाओं को भी पूर्ण करते हैं, इसलिए श्रावण का महीना अर्द्धनारीश्वर शिव की समाराधना का खास महीना कहलाता है।

उत्तराखंड शिव-शक्ति के सम्मिलन की भूमि-

उत्तराखंड हिमालय भगवान शिव की लीला-भूमि भी है और क्रीड़ा-भूमि भी। यहाँ शिव और शक्ति के सम्मिलन से ही लोक संस्कृति का भी विकास हुआ। जैसे- हिमालये तु केदारम् ...........

दरअसल, उत्तराखंड की शक्ति पूजा यहाँ के मूल निवासी महाकवि कालिदास के "जगतः पितरौ वंदे पार्वती-परमेश्वरौ" की अवधारणा से प्रभावित है जिसके अनुसार जगत के सृष्टिकर्ता माता-पिता के रूप में शिव और शक्ति की उपासना की जाती है। जैसे-

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।

जगतः पितरौ वन्दे   पार्वतीपरमेश्वरौ।।

अर्थात् -

वाणी और अर्थ की सिद्धि के निमित्त (वागर्थप्रतिपत्तये) मैं वंदना करता हूँ (वन्दे) वाणी और अर्थ की (वागर्थाविव) मिले हुए (संपृक्तौ) जगत् के (जगतः) माता-पिता (पितरौ) शिव-पार्वती को नमन करता हूँ (पार्वतीपरमेश्वरौ)।

शिव शक्ति से अनुप्राणित लोक संस्कृति-

उत्तराखंड की मुख्य लोक संस्कृति शिव-शक्ति से अनुप्राणित लोक संस्कृति रही है। गढ़वाल और कुमाऊँ आँचलों में आयोजित होने वाले पर्व,उत्सव और मेले अधिकांश रूप से शिव और उनकी अर्द्धांगिनी शक्ति से अनुप्राणित मेले हैं। उत्तराखंड का नंदादेवी राजजात यात्रा का महापर्व हो राजजात या नन्दाजात का अर्थ है राज राजेश्वरी नन्दादेवी की यात्रा। गढ़वाल क्षेत्र में देवी-देवताओं की जात बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। जात का अर्थ होता है देव-यात्रा। लोक विश्वास यह है कि नन्दा देवी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में अपने मैत (मायके) पधारतीं हैं। कुछ दिन के पश्चात उन्हें अष्टमी को मैत से विदा किया जाता है। राजजात या नन्दा जात देवी नन्दा की अपने मैत से एक सजीं-संवरी दुल्हन के रुप में ससुराल जाने की यात्रा है। ससुराल को स्थानीय भाषा में सौरास कहते हैं। इस अवसर पर नन्दादेवी को सजाकर डोली में बिठाकर एवं वस्त्र, आभूषण, खाद्यान्न, कलेवा, दूज आदि उपहार देकर पारम्परिक विधि-विधान से विदा किया जाता है।

वैसे तो हर साल नन्दाजात के आयोजन की प्रथा है परन्तु बारहवें वर्ष पर भव्य और मनोरंजक राज-जात किया जाता है। नन्दाजात प्रतिवर्ष शुक्ल अष्टमी के दिन मनाई जाती है। नन्दा अष्टमी के दिन नन्दा को डोली में बिठाकर विदा किया जाता है। नैनीताल, वैजनाथ और अल्मोड़ा में विशेष धूमधाम से यह उत्सव मनाया जाता है। नैनीताल का प्रसिद्ध नन्दा-सुनन्दा मेले का प्रतिवर्ष आयोजन किया जाता है जिसमें नन्दा-सुनन्दा बहनों की विशिष्ट और अनूठी केले के पेड़ से बनी मूर्तियों को जो कि समस्त भारत में केवल कुमाऊँ में ही बनाई जाती है। उन्हें डोली में बिठाकर घुमाया जाता है। अन्तत: मूर्ति को नैनी झील में विसर्जित कर दिया जाता है।

कुमाऊँ में नन्दा की एक विशेषता यह भी है कि गरुड़ के कोट भ्रामरी मन्दिर में नन्दादेवी का अवतार एक पुरुष के शरीर में होता है जबकि उत्तराखण्ड के अन्य क्षेत्रों में देवी अवतार स्त्री शरीर में व देवता का अवतार पुरुष शरीर में होता है। 

ईष्ट देवी होने के कारण नन्दादेवी को राजराजेश्वरी कहकर सम्बोधित किया जाता है। नन्दादेवी दक्ष प्रजापति की सात कन्याओं में से एक थीं। उनका विवाह शिव के साथ हुआ था। नन्दादेवी को पार्वती का रूप ही माना गया है। पूरे उत्तराखंडवासियों की आराध्य होने के कारण नन्दादेवी की उत्तराखंड की कुलदेवी और समस्त प्रदेश को धार्मिक एकता के सूत्र में पिरोने वाली शिव की अर्द्धांगिनी शक्ति के रूप में आराधना की जाती है।

श्रावण मास के इस पवित्र महीने में जगत-पिता भगवान शिव और जगत जननी शक्ति स्वरूपा माँ भगवती पार्वती का हमारे प्रति सदा सुख-शांति और आनंद से परिपूर्ण वात्सल्य भाव तथा आशीर्वाद बना रहे। ॥ 

ॐ नमः शिवाय॥

सन्तोष काण्डपाल 

कार्यकर्ता गढ़कुमाऊँ संगठन

उत्तराखण्ड


Friday, 16 July 2021

हरेला पर्व 2021: कुमाऊँ में धूमधाम से मनाया जाता है यह पर्व

हरेला एक हिंदू त्यौहार है जो मूल रूप से उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में मनाया जाता है । हरेला पर्व वैसे तो वर्ष में तीन बार आता है, परन्तु सर्वाधिक धूम-धाम से सूर्य का कर्क राशि में प्रवेश के समय श्रावण मास की प्रथम गते जिसको हम संक्रान्ति भी कहते हैं, अर्थात अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार जुलाई मास के मध्य में यह त्यौहार मनाया जाता है।

जिस प्रकार से हम नवरात्रों का पूजन करते हैं और नवरात्रों में प्रतिपदा अर्थात् प्रथम नवरात्रे को हरियाली बो देते हैं और नवमी के दिन उसको पूजन करके काट दिया जाता है ठीक उसी प्रकार से हरेला में भी श्रावण मास लगने से नौ दिन पूर्व हरियाली को बो देते हैं और जिस दिन कर्क संक्रान्ति होती है अर्थात श्रावण मास का प्रथम दिन होता उस दिन हरियाली को काट दिया जाता है। 


इसके तीन प्रकार-

1- चैत्र मास में – चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हरियाली बोयी जाती है और नवमी को काटी जाती है।

2- श्रावण मास में - श्रावण मास प्रारम्भ होने से नौ दिन पहले आषाढ़ मास में हरियाली को बोया जाता है और नौ दिन बाद श्रावण मास के प्रथम दिन काटा जाता है।

3- आश्विन मास में - आश्विन मास में प्रथम नवरात्रे के पहले दिन हरियाली बोयी जाती है और नवमी के दिन हरियाली काटी जाती है।

सनातन सभ्यता में जितने भी व्रत पर्व त्यौहार इत्यादि आते हैं वह सब प्रकृति का सूचांक माना जाता है। जैसे - 

चैत्र व आश्विन मास में बोयी जाने वाली हरेला मौसम के बदलाव के सूचक है।

चैत्र मास में बोया/काटा जाने वाला हरेला ग्रीष्म ऋतु के आगमन की सूचना देता है।

तो वहीं पर आश्विन मास में बोयी जाने वाली हरेला शिशिर ऋतु के आगमन की सूचना देता है।

लेकिन श्रावण मास में मनाये जाने वाला हरेला पर्व का सामाजिक रूप से अपना विशेष महत्व है, तथा समूचे कुमाऊँ में इसे अति महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक माना जाता है। जिस कारण इस अन्चल में यह त्यौहार अधिक धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

जैसा कि हम सभी को विदित है कि श्रावण मास भगवान भोलेशंकर का प्रिय मास है, इसलिए हरेला के इस पर्व को कहीं कहीं हर-काली के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि श्रावण मास शंकर भगवान जी को विशेष प्रिय है। यह तो सर्वविदित ही है कि उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और पहाड़ों पर ही भगवान शंकर का वास माना जाता है। 

इसलिए भी उत्तराखण्ड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला का अधिक महत्व है।  हरेला पर्व उत्तराखंड के अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश में भी हरियाली पर्व के रूप में मनाया जाता है।

हरियाली या हरेला शब्द पर्यावरण के काफी करीब है। ऐसे में इस दिन सांस्कृतिक आयोजन के साथ ही पौधारोपण भी किया जाता है। जिसमें लोग अपने परिवेश में विभिन्न प्रकार के छायादार व फलदार पौधे रोपते हैं।

सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूँ, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों को बो दिया जाता है।

 नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह को पानी छिड़कते रहते हैं। दसवें दिन इसे काटा जाता है। 4 से 6 इंच लम्बे इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है। घर के सदस्य इन्हें बहुत आदर के साथ अपने शीश पर रखते हैं। 

घर में सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में हरेला बोया व काटा जाता है। इसके मूल में यह मान्यता निहित है कि हरेला जितना बड़ा होगा उतनी ही फसल बढ़िया होगी। साथ ही प्रभू से फसल अच्छी होने की कामना भी की जाती है।

इस दिन कुमाऊँनी भाषा में गीत गाते हुए छोटों को आशीर्वाद दिया जाता है –

जी रये, जागि रये, तिष्टिये, पनपिये,

दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइये,

हिमाल में ह्यूं छन तक, गंग ज्यू में पांणि छन तक,

यो दिन और यो मास भेटनैं रये, अगासाक चार उकाव, धरती चार चकाव है जये,

स्याव कस बुद्धि हो, स्यू जस पराण हो।”

जी राय, जागि राय यो दिन बार भेटने राये स्याव जस बुद्धि है जो। बल्द जस तराण हैं जो। दुब जस पनपने राये। कफुवे जस धात हैं जो। पाणी वाई पतौउ हैं जो।

आफू सब ईष्ट मित्रों कै उत्तराखण्डी लोकपर्व हरयाव क हार्दिक बधाई छ। हमर कुमाऊनी संस्कृति हमर पच्छ्याण।


Monday, 12 July 2021

गढ़कुमाऊँ संगठन उत्तराखण्ड की साप्ताहिक मीटिंग में इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर हुई चर्चा



गढ़कुमाऊँ संगठन उत्तराखण्ड की सप्ताहिक मीटिंग दिनांक 11-जुलाई-2021 कोसाप्ताहिक मीटिंग सायंकाल 6 से प्रारम्भ हुई, जिसमें मुख्य उद्देश्य भू-कानून एवं संगठन का विस्तारीकरण था। मीटिंग संचालन कर्ता डॉ. नवीन पाण्डेय ने सभी प्रतिनिधियों के समक्ष चर्चा के मुख्य बिन्दुओं पर अपनी बाते रखी, जिसमें भू-कानून को कैसे उत्तराखण्ड में संगठन के माध्यम से एक आँधी की तरह से फैलाया जाए? साथ ही उन्होंने कहा है कि संगठन में जितने भी प्रतिनिधि प्रतिभाग कर रहे हैं उन सभी को अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करना होगा और ऐसे युवाओं को आगे लाना होगा जो उत्तराखण्ड की इस पीड़ा को भली भाँति समझते हों, जिनके हृदय में उत्तराखण्ड के लिए कुछ अच्छा कर गुजरने की छमता हो।

सर्वप्रथम देहरादून से डॉ. राजीव जी ने कहा हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने गांव से जोड़कर रखना चाहिए जिससे उनके मन मस्तिष्क में सदैव अपनी संस्कृति से जुड़ाव रहेगा। आवागमन का मार्ग भी उत्तराखण्ड में लगभग दुरुस्त हो चुके हैं तो हमें सप्ताह के अन्त में या मास के अन्त में गांव अवश्य जाना चाहिए। रुद्रप्रयाग विधानसभा से मातृ शक्ति का नेतृत्व कर रही संगठन में रजनी जी ने कहा है कि हमारा संगठन भू-कानून के ऊपर बहुत ही उत्तम जंग लड़ रहा है, जिससे आने वाले समय में यह उत्तराखण्ड के लिए मील का पत्थर साबित होगा। महिलाओं का शोषण आज भी बना हुआ है समाज में जिसके लिए हमें खुद आवाज उठानी पड़ेगी। गढ़कुमाऊँ संगठन में सदैव समर्पित रहेंगे और प्रतिदिन एक नए कार्यकर्ता का निर्माण करते रहेंगे।


रूद्रप्रयाग से विजय भट्ट ने कहा है कि हमें सभी हिन्दू भाई-बहनों का संगठन खड़ा करने की आवश्यकता है, जो सक्षम हैं उन सभी को अपने कोष से धन एकत्रित करके उन जरूरतमन्द उत्तराखण्ड वासियों की सहायता करनी चाहिए जो लघु उद्योग या फिर छोटे से छोटा कार्य प्रारम्भ करना चाहता हो। नरेन्द्र नगर विधानसभा से डॉ. सुशील बिजल्वाणा जी ने कहा कि हमें संगठित होकर कार्य करना चाहिए उन्होंने एक उदाहरण के माध्यम से कहा है कि एक लकड़ी को कोई भी तोड़ सकता है परन्तु वही लकड़ी यदि एक गट्ठर में रहेंगी तो कोई भी उनको नहीं तोड़ सकता है। इसीलिए हमें भी गढ़कुमाऊँ संगठन उत्तराखण्ड के माध्यम से संगठित रहना है ताकि बाहरी लोगों की बुरी नजर हमारी देव भूमि पर न पड़े।

पौड़ी जिले से धर्मेन्दर जी ने कहा हमें अपने-अपने क्षेत्र से प्रतिनिधित्व कर के स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ानी चाहिए और मैं खुद सतपुली से एक गढ़कुमाऊँ संगठन का ग्रुप तैयार कर रहा हूं जिसमें स्थानीय युवा प्रतिभाग करेंगे और इस मुहिम को आगे बढ़ाएंगे जिससे संगठन को मजबूती प्रदान होगी। चमोली जिले से अभिषेक जी ने अपने विचारों में कहा है कि हम चाहे जहां भी रहे हमें अपने मूलनिवास से जुड़े रहना चाहिए। बाहरी राज्यों से आए किसी भी बुरी नजर वालों को हम उत्तराखण्ड में टिकने नहीं देंगे।

धनौल्टी विधानसभा क्षेत्र से रोहित उनियाल जी ने बताया है कि हमारे क्षेत्र में बाहरी राज्यों से आये हुए शरणार्थियों ने बहुत अधिक मात्रा में अतिक्रमण कर दिया है परन्तु सत्ताधारी सरकार इस पर कोई ठोस

नीति नहीं बना रही सब वोट बैंक की राजनीति हो चल रही है। 

Friday, 2 July 2021

उत्तराखण्ड के पारम्परिक मकानों का परिदृश्य



पहाड़ में परम्परागत बने मकानों में स्थानीय रूप से उपलब्ध पत्थर, मिट्टी अथवा लकड़ी का प्रयोग होता आया है। पत्थर के बने मकान जिन पर मिट्टी के बने गारे से पत्थर की चिनाई की जाती थी। स्थानीय रूप से उपलब्ध मजबूत लकड़ी से दरवाजा, छज्जा अथवा खिड़कियाँ बनाई जाती थी। जिसमें सुन्दर नक्काशी की जाती थी। घर की छत में मोटी चौकोर पाल पड़ता जिसे ‘भरणा’ कहा जाता है। यह चीड़ की लकड़ी का अच्छा माना जाता है।  धुरी में भराणा डालकर छत की दोनों ढलानों में बाँसे रखकर इनके ऊपर बल्लियां रखी जाती है। बल्लियों के ऊपर दादर या फाड़ी हुई लकड़ियाँ बिछाई जाती थी या तो तख्ते चिरवा के लगा दिये जाते हैं। इनके उपर चिकनी मिट्टी के गारे से पंक्तिवार पाथर(पठाल) चौड़े पत्थर बिछ होते हैं। दो पाथर रखा जाता है जिसे तोप कहते हैं। घर के कमरों में चिकनी मिट्टी और भूसी मिला कर फर्श बिछाया जाता है। जिसे पाल भी कहा जाता है तथा इसे गोबर से लीपा जाता है। दीवारों में एक हाथ की ऊंचाई तक गोबर से लीपा जाता है। दीवारों में एक हाथ की ऊँचाई तर गेरू का लेपन कर बिस्वार से तीन या पाँच की धारा में वसुधारा डाली जाती है। गेरु औ बिस्वार से ही ऐपणि पड़ते हैं। अलग अलग धार्मिक आयोजनों व कर्मकाण्डों में इनका स्वरूप भिन्न होता है। हर घर के भीतरी कक्ष में पूर्व या उत्तर दिशा के कोने में पूजा के लिए मिट्टी की वेदी बनाई जाती है जो द्याप्ता अथवा ठ्या (देवस्थान) के नाम से जाना जाता है। बाखली में मकान एक बराबर ऊँचाई के तथा दो मंजिला या तीन मंजिला होते थे।


पहली मंजिल में छज्जे के आगे पत्थरों की सबेली (लाईन) करीब एक हाथ आगे को निकली रहती है जो झाप कहलाती है। ऊपरी दूसरी मंजिल में दोनों तरफ ढालदार छत होती है जिसे पटाल या स्लेट से छाया जाता है नीचे का भाग गोठ (बेसमेंन्ट) के नाम से जाना जाता है जिसमें पालतू पशु रहते हैं और ऊपरी मंजिल में पारिवारिक सदस्य दो मंजिल के आगे वाले हिस्से को चाख(मकान का बराम्दा) कहते हैं जो बैठक का कमरा होता है। सभी घरों के आगे पटाल बछा पटांगण होता है जिसके आगे करीब एक हाथ चौड़ी दीवार होती है जो बैठने के भी काम आती है।

पहाड़ की संस्कृति, रहन-सहन, भेष-भूसा एवं खान-पान सामाजिक जीवन में लोकोक्तियाँ, मुहावरे, किस्से-कहानियाँ, प्रतीक तथा बिम्ब ऐसे हैं जो पहाड़ में जिये और पहाड़ को जाने बिना समझ पाना नामुमकिन हैं। ये बात अलग है कि समय प्रवाह में न तो आज गाँव की लम्बी-२ बाखलिया रही और न ही उनमें रहने वाले लोग। अब न वहाँ पाथर (पत्थर) की छतें रही, न चाख, गोठ और मलभतेर (अन्दर वाला कमरा) वाले कमरे, न खोईक भिड़ (दिवार) और न चौथर रहे और न पटांगण(आंगन) में बनी ओखली। यदि पलायन के बाद कुछ गाँव अब भी अस्तित्त्व में हैं तो सब धीरे-धीरे लैण्टर के बने आधुनिक सुख-सुविधायुक्त मकान बनने लगे हैं। 



पुराने घरों के खोईक भिड़ (आँगन की दीवार) और चौथर (घर के अन्दर प्रवेश हेतु सीढियाँ) हमारे जीवन के सुख-दु:ख के गवाह हुआ करते थे। खोईक भिड़ व चौथर उन लोगों की समझ से बाहर है, जिन्होंने पहाड़ों के मकान कभी देखें ही नहीं। दरअसल पहाड़ों में ढलान पर बने घरों के आँगन को तीन ओर दीवारों से घेरा जाता है, ये दीवारें सुरक्षा की दृष्टि से तथा बैठने के उपयोग हेतु बनाई जाती हैं। इसी को खोई अर्थात् खोली बोला जाता है। 

वर्तमान दौर में पहाड़ों के आधुनिक मकानों में वह रौनक नहीं रही जो हमारे पारम्परिक मकानों में हुआ करती थी और न ही पहाड़ों के खेत-खलिहानों की रौनक रही। थोड़ा होश संभाला तो पढ़ाई अथवा काम की तलाश में दूसरे शहरों को भाग गये, फिर वहीं शहरी जीवन उन्हें भी रास आने लगा और वहाँ से (शहरों से) लौटकर आये भी तो साथ में शहरी संस्कृति को लेकर ,जहाँ उनके ड्राइंग रूम तक ही उनकी दुनियाँ सीमित रह गयी। दुर्भाग्यवश कोई गाँव में ही अटके रह गये, वे भी तथाकथित सभ्यता का लबादा ओढ़कर मॉर्डन बनने की दौड़ में तथाकथित मॉर्डन तो नहीं हो पाये, लेकिन अपने ठेठ पहाड़ी अन्दाज को भी खो बैठे। गर्मियों के दिनों में चाँदनी रातों की गप-शप हो अथवा जाड़ों में सामूहिक रूप से आग तापने का उपक्रम हो, ये खोईक भिड़ (आँगन की दीवार) सदा गुलजार रहते थे। परन्तु एकाकीपन से दूर सामूहिकता व परस्पर सहयोग का आभास कराते ये खोईक भिड़ अब विलुप्त के कगार पर हैं जो पुराने घरों में खोईक भिड़ मौजूद भी हैं वे उनको गुलजार करने वाले व्यक्तियों के अभाव में निर्जीव बन अन्तिम साँसें गिन रहे हैं।

कार्यकर्ता गढकुमाऊँ संगठन उत्तराखण्ड 

सन्तोष कुमार

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