Tuesday, 20 July 2021

भगवान शिव का प्रिय मास है श्रावण, जानें इसका कारण



द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरं। सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥



हरेला पर्व संक्रान्ति के आगमन (१६ जुलाई२०२१)के साथ ही उत्तराखंड में श्रावण का पवित्र महीना भी शुरु हो गया है। श्रावण मास में भगवान भोलेनाथ की आराधना करना बहुत ही पुण्यदायी और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। ''भगवान शिव'' को श्रावण का महीना बहुत प्रिय है क्योंकि वे इसी महीने अपनी शक्ति के साथ सायुज्य प्राप्त करते हुए समस्त सृष्टि का सर्जन करते हैं।



'शिव'- सर्वहारा वर्ग के संरक्षक देव-

भारतीय परम्परा में शिव परब्रह्म,परमात्मा,रुद्र,महादेव आदि विभिन्न नामों से जाने जाते हैं। 'शिव’ शब्द की एक व्याख्या के अनुसार अनन्त तापों से संतप्त होकर प्राणी जहाँ विश्राम हेतु शयन करते हैं अथवा प्रलय की अवस्था में जगत जिसमें शयन करता है उसे 'शिव’ कहते हैं - 'शेरते प्राणिनो यत्र स शिवः’ अथवा 'शेते जगदस्मिन्निति शिवः’  भगवान राम तथा कृष्ण का आविर्भाव क्रमशः त्रेता तथा द्वापर युग में होता है किन्तु शिव सृष्टि के आदिकाल से ही प्रत्येक युग में दीन-हीन, निर्बल,असहाय तथा सर्वहारा वर्ग के संरक्षक देव हैं।

शिव-शक्ति की कृपा का मास सावन-

भारतीय परम्परा में सावन का महीना अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह महीना पूरी तरह से भगवान शिव को समर्पित है। इस माह में विधिपूर्वक शिवजी की आराधना करने से मनुष्य को शुभ फल प्राप्त होते हैं। सावन के महीने की विशेष महिमा इसलिए भी है क्योंकि इस महीने में ही पार्वती जी ने शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी और शिव ने उन्हें इसी माह में दर्शन भी दिए थे। तभी से सावन माह को शिवजी की तपस्या और पूजा-पाठ और उनकी कृपा पाने के लिए विशेष शुभ माह माना जाने लगा है। पुराणों के अनुसार सावन में भगवान शंकर की पूजा, अभिषेक, मंत्र-जाप करने से कई गुणा फल प्राप्त होता है। खासकर सोमवार के दिन महादेव की आराधना से शिव और शक्ति दोनों प्रसन्न होते हैं। इनकी कृपा से मनुष्य को दैविक,दैहिक और भौतिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। निर्धन को धन, नि:संतान को संतान और कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर प्राप्त होता है।

क्यों प्रिय है शिव को श्रावण मास ?

भारत के समस्त उप-महाद्वीप के लिए कल्याणकारी श्रावण या सावन का महीना वैसे भी दक्षिण-पश्चिमी मानसून के आगमन से जुड़ा महीना होने के कारण कृषि और खेती-बाड़ी के लिए भी खास महीना है। धरती के उदर में सृष्टि के बीजों के अंकुरण होने के कारण इस महीने प्रकृति का कण-कण चारों ओर हरियाली से भरपूर रहता है। भगवान शिव को श्रावण मास सबसे प्रिय महीना इसलिए भी लगता है क्योंकि श्रावण मास में सबसे अधिक वर्षा होती है जो शिव के तपस्या से तप्त शरीर को शीतलता व आनन्द प्रदान करता है।


पौराणिक आख्यानों में भगवान शंकर ने स्वयं सनत कुमारों को सावन महीने की महिमा बताते हुए कहा है कि मेरे तीनों नेत्रों में सूर्य दाहिने, चन्द्रमा बाएँ और अग्नि मध्य नेत्र में  विराजमान हैं। भारतीय काल गणना में महीनों के नाम नक्षत्रों के आधार पर रखे गए हैं। जैसे वर्ष का पहला माह चैत्र होता है, जो चित्रा नक्षत्र के आधार पर पड़ा है, उसी प्रकार श्रावण महीना 'श्रवण' नक्षत्र के आधार पर रखा गया है। गौरतलब है कि श्रवण नक्षत्र का स्वामी भी चन्द्रमा है। चन्द्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है। जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है जिसका स्वामी चन्द्रमा है, तब श्रावण महीना प्रारम्भ होता है। यानी सूर्य गर्म है और वह शीतल ग्रह चन्द्रमा के घर में प्रवेश करता है इसलिए मौसम वैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य के कर्क राशि में आने से झमा-झम बारिश का मौसम बनने लगता है जिसके फलस्वरूप लोक-कल्याण के लिए विष को ग्रहण करने वाले देवों के देव महादेव और निरन्तर तपस्यारत देवाधिदेव शिव को चंद्रस्वरूपा व प्रकृतिरूपा पार्वती के संसर्ग से शीतलता और आनन्द की अनुभूति होती है। यही कारण है कि भगवान शिव को श्रावण मास से विशेष लगाव है। इस महीने शिव अपनी प्रकृति रूपा शक्ति पार्वती के साथ एकीभाव होकर मनुष्य के प्रति अपना कृपा-भाव प्रकट करने के लिए लोक-कल्याण हेतु तत्पर रहते हैं।

शिव व शक्ति के मिलन का महीना-

भारतीय ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य ग्रह उग्र और पिता का कारक ग्रह माना जाता है और शीतल प्रकृति का चंद्रमा मातृत्व का कारक ग्रह है। श्रावण मास इन दोनों के मिलन का मास है। समस्त सृष्टि के पिता भगवान शिव इसी श्रावण मास में मेघ का रूप धारण करके हिमसुता प्रकृति परमेश्वरी पार्वती के साथ विवाह रचाने हिमालय पर्वत में जाते हैं जिसकी वजह से मानसूनी वर्षा होती है और पृथ्वी रत्नगर्भा वसुंधरा का रूप धारण करती है। इसी वर्षा से धरती में नदियाँ वेग रूप से प्रवाहित होती हैं, वानस्पतिक संपदा और फल-फूल पैदा होते हैं, खेतों में अन्न उपजता है और समस्त प्राणियों का भरण-पोषण होता है। श्रावण के महीने का यही पर्यावरण वैज्ञानिक स्वरूप है। श्रावण आने से पहले प्रबोधनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता के सारे दायित्वों से मुक्त होकर अपने दिव्य भवन पाताल लोक में विश्राम करने के लिए गमन करते हैं और अपना सारा कार्यभार महादेव शिव को सौंप देते हैं। तब भगवान शिव ही पार्वती के साथ मिलकर इस श्रावण मास के दौरान पृथ्वी लोक में सृष्टि-सर्जन, लोक-धारण का दायित्व पूरा करते हैं। शिव और पार्वती जगत के माता-पिता के रूप में पृथ्वीवासियों के कष्टों को हरते हैं एवं उनकी मनोकामनाओं को भी पूर्ण करते हैं, इसलिए श्रावण का महीना अर्द्धनारीश्वर शिव की समाराधना का खास महीना कहलाता है।

उत्तराखंड शिव-शक्ति के सम्मिलन की भूमि-

उत्तराखंड हिमालय भगवान शिव की लीला-भूमि भी है और क्रीड़ा-भूमि भी। यहाँ शिव और शक्ति के सम्मिलन से ही लोक संस्कृति का भी विकास हुआ। जैसे- हिमालये तु केदारम् ...........

दरअसल, उत्तराखंड की शक्ति पूजा यहाँ के मूल निवासी महाकवि कालिदास के "जगतः पितरौ वंदे पार्वती-परमेश्वरौ" की अवधारणा से प्रभावित है जिसके अनुसार जगत के सृष्टिकर्ता माता-पिता के रूप में शिव और शक्ति की उपासना की जाती है। जैसे-

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।

जगतः पितरौ वन्दे   पार्वतीपरमेश्वरौ।।

अर्थात् -

वाणी और अर्थ की सिद्धि के निमित्त (वागर्थप्रतिपत्तये) मैं वंदना करता हूँ (वन्दे) वाणी और अर्थ की (वागर्थाविव) मिले हुए (संपृक्तौ) जगत् के (जगतः) माता-पिता (पितरौ) शिव-पार्वती को नमन करता हूँ (पार्वतीपरमेश्वरौ)।

शिव शक्ति से अनुप्राणित लोक संस्कृति-

उत्तराखंड की मुख्य लोक संस्कृति शिव-शक्ति से अनुप्राणित लोक संस्कृति रही है। गढ़वाल और कुमाऊँ आँचलों में आयोजित होने वाले पर्व,उत्सव और मेले अधिकांश रूप से शिव और उनकी अर्द्धांगिनी शक्ति से अनुप्राणित मेले हैं। उत्तराखंड का नंदादेवी राजजात यात्रा का महापर्व हो राजजात या नन्दाजात का अर्थ है राज राजेश्वरी नन्दादेवी की यात्रा। गढ़वाल क्षेत्र में देवी-देवताओं की जात बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। जात का अर्थ होता है देव-यात्रा। लोक विश्वास यह है कि नन्दा देवी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में अपने मैत (मायके) पधारतीं हैं। कुछ दिन के पश्चात उन्हें अष्टमी को मैत से विदा किया जाता है। राजजात या नन्दा जात देवी नन्दा की अपने मैत से एक सजीं-संवरी दुल्हन के रुप में ससुराल जाने की यात्रा है। ससुराल को स्थानीय भाषा में सौरास कहते हैं। इस अवसर पर नन्दादेवी को सजाकर डोली में बिठाकर एवं वस्त्र, आभूषण, खाद्यान्न, कलेवा, दूज आदि उपहार देकर पारम्परिक विधि-विधान से विदा किया जाता है।

वैसे तो हर साल नन्दाजात के आयोजन की प्रथा है परन्तु बारहवें वर्ष पर भव्य और मनोरंजक राज-जात किया जाता है। नन्दाजात प्रतिवर्ष शुक्ल अष्टमी के दिन मनाई जाती है। नन्दा अष्टमी के दिन नन्दा को डोली में बिठाकर विदा किया जाता है। नैनीताल, वैजनाथ और अल्मोड़ा में विशेष धूमधाम से यह उत्सव मनाया जाता है। नैनीताल का प्रसिद्ध नन्दा-सुनन्दा मेले का प्रतिवर्ष आयोजन किया जाता है जिसमें नन्दा-सुनन्दा बहनों की विशिष्ट और अनूठी केले के पेड़ से बनी मूर्तियों को जो कि समस्त भारत में केवल कुमाऊँ में ही बनाई जाती है। उन्हें डोली में बिठाकर घुमाया जाता है। अन्तत: मूर्ति को नैनी झील में विसर्जित कर दिया जाता है।

कुमाऊँ में नन्दा की एक विशेषता यह भी है कि गरुड़ के कोट भ्रामरी मन्दिर में नन्दादेवी का अवतार एक पुरुष के शरीर में होता है जबकि उत्तराखण्ड के अन्य क्षेत्रों में देवी अवतार स्त्री शरीर में व देवता का अवतार पुरुष शरीर में होता है। 

ईष्ट देवी होने के कारण नन्दादेवी को राजराजेश्वरी कहकर सम्बोधित किया जाता है। नन्दादेवी दक्ष प्रजापति की सात कन्याओं में से एक थीं। उनका विवाह शिव के साथ हुआ था। नन्दादेवी को पार्वती का रूप ही माना गया है। पूरे उत्तराखंडवासियों की आराध्य होने के कारण नन्दादेवी की उत्तराखंड की कुलदेवी और समस्त प्रदेश को धार्मिक एकता के सूत्र में पिरोने वाली शिव की अर्द्धांगिनी शक्ति के रूप में आराधना की जाती है।

श्रावण मास के इस पवित्र महीने में जगत-पिता भगवान शिव और जगत जननी शक्ति स्वरूपा माँ भगवती पार्वती का हमारे प्रति सदा सुख-शांति और आनंद से परिपूर्ण वात्सल्य भाव तथा आशीर्वाद बना रहे। ॥ 

ॐ नमः शिवाय॥

सन्तोष काण्डपाल 

कार्यकर्ता गढ़कुमाऊँ संगठन

उत्तराखण्ड


2 comments:

  1. जय शंकर हर हर महादेव शम्भु

    ReplyDelete
  2. हर हर महादेव

    ReplyDelete

उत्तराखण्ड में भू कानून की आड़ में क्या चल रहा है खेल

बिना दाँत के व्यक्ति को अगर गन्ना चूसने के लिए दे दिया जाए तो उसकी हालत शायद वैसी ही होगी जैसे कमजोर भू-क़ानून के साथ किसी राज्य की होती है,...