Thursday, 22 July 2021

उत्तराखण्ड में भू कानून की आड़ में क्या चल रहा है खेल



बिना दाँत के व्यक्ति को अगर गन्ना चूसने के लिए दे दिया जाए तो उसकी हालत शायद वैसी ही होगी जैसे कमजोर भू-क़ानून के साथ किसी राज्य की होती है, मतलब राज्य के संसाधनों का आनंद लेने में स्वयं राज्य असमर्थ रहता है, किसी भी राज्य के लिए राज्य हितैषी भू-क़ानूनों की चर्चा एक भावुक विषय है और इन दिनों उत्तराखंड में भू-क़ानूनों की माँग यह दर्शता है कि राजनैतिक दल इस विषय पर हल्ला मचाकर दो-चार प्रतिशत मतों को 2022 के विधानसभा चुनावों में प्रभावित करने के इच्छुक हैं । 

मीडिया और सोशल मीडिया पर भू-क़ानून की माँग तो हो रही है परन्तु भू-क़ानूनों के स्वरूप पर चर्चा नहीं हो रही है, मतलब दवाई तो माँगी जा रही है परन्तु बीमारी नहीं बताई जा रही है , उत्तराखंड में भू-क़ानून तो आज भी हैं और बिना भू-क़ानूनों के राज्य की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती है , उत्तराखंड राजस्व विभाग की वेबसाइट पर जाकर क़ानून और नियमों की जानकारी भी ली जा सकती है । क़ानून पूर्ण रूप से सफल रहें ऐसा भी नहीं है वर्ना IPC की धारा 302 कत्ल होने से रुकवा देती, लेकिन किसी क़ानून की आड़ में अपराध होने लग जाएँ तो स्तिथि का दुर्भाग्यपूर्ण हो जाना लाज़मी है और तब क़ानूनों के अस्तित्व और उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह उठने लगते हैं , उत्तराखंड के भू-क़ानून भी आज सवालों के घेरे में हैं , मुझे लगता है कि इन भू-क़ानूनों की आड़ में ही भू-अपराध हो रहे हैं । 



सवाल यह उठता है कि पिछले बीस वर्षों में जिन लोगों को section 154 के तहत कृषि योग्य भूमि ख़रीदने की अनुमति मिली और section 143 के तहत जिन्होंने ख़रीदी गई भूमि का लैंड यूज बदलवा लिया क्या उन ज़मीनों पर section 143 की अनुमति लेने के समय प्रस्तावित व्यवसाय आरम्भ हो गये हैं ? अगर हाँ तो क्या इसकी कोई जाँच रिपोर्ट बनती है , क्या कोई ऐसा डाटा भी तैयार किया गया है कि उन व्यवसायों में कितने प्रतिशत उत्तराखंडियों को रोज़गार मिला और उत्तराखंड को कितने प्रतिशत राजस्व का फ़ायदा हुआ, अगर नहीं तो फिर क्यों नहीं उनके section 143 की अनुमति को रद्द कर दिया जाए ?  क्या section 154 के तहत ज़मीन ख़रीदने की अनुमति लेकर उत्तराखंड में कितनी भी ज़मीन ख़रीदकर और section 143 के तहत ज़मीन का लैंड यूज बदलवाकर उत्तराखंड की ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करना या करवाना ठीक है? हमें इन फ़र्ज़ी व्यवस्थाओं के ख़िलाफ़ भी क़ानूनों की माँग करनी चाहिए । 

सबसे हास्यास्पद क़ानून यह है कि एक व्यक्ति  केवल 250 मीटर कृषि योग्य भूमि ख़रीद सकता है और एक ही परिवार के चार सदस्य 250-250 मीटर की चार अलग-अलग रजिस्ट्री करवा सकते हैं , मतलब एक व्यक्ति सीधे तौर पर 1000 मीटर ज़मीन नहीं ख़रीद सकता परन्तु जुगाड़बाजी कर 1000 मीटर का मालिक बन सकता है ,मतलब हम क़ानून भी बना रहे हैं और क़ानून की धज्जियाँ उड़ाने का मंत्र भी साथ-साथ दे रहे हैं , क्या भविष्य में कभी ये भी देखा जाएगा कि 250-250 मीटर की अलग-अलग ज़मीनों का अलग-अलग उपयोग हो रहा है या नहीं? अगर नहीं तो हमें इन व्यवस्थाओं के विरूद्ध भी क़ानून की माँग करनी चाहिए । 



कई पढ़े-लिखे मित्रों कि शिकायत और सवाल है कि अगर हम उत्तराखंड में किसी को ज़मीन नहीं ख़रीदने देंगे तो हमें उत्तराखंड से बाहर ज़मीन ख़रीदने का क्या अधिकार है ? उन मित्रों को शायद बाहरी राज्यों के सशक्त भू-क़ानूनों के संदर्भ में ज्ञान कम है , मैं उन्हें चुनौती देता हूँ कि वो केवल नौयडा उत्तर-प्रदेश में एक इंच कृषि योग्य ज़मीन ख़रीदकर उसका section 143 के अंतर्गत लैंड यूज बदलवाकर दिखा दें या कोई ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर दें  जिन्होंने किसान से ज़मीन ख़रीदकर लैंड यूज बदलवा लिया हो बाक़ी राज्यों की बात तो बाद में करेंगे, ये उत्तराखंड ही है जिसपर ये कहावत सटीक बैठती है- अन्धेर नगरी चौपटराज। 

मौजूदा भू-क़ानूनों के दाँत घिस गये हैं या तोड़ दिये गये हैं , 154 और 143 की फ़ाइलें DM से राजस्व उप-निरीक्षक और राजस्व उपनिरीक्षक से DM तक दौड़ती हैं परन्तु जिनको  कोई काम नहीं करने उनके काम बन जाते हैं और जिन्हें हक़ीक़त में काम करना है उनके काम नहीं बनते, अक्सर यह देखा गया है कि 143 करवाकर बाहरी व्यक्ति द्वारा लंबी चौड़ी ज़मीन ख़रीदकर उसमें बाग और बंगला बना लिया जाता है फिर उस संपत्ति की  देखरेख करने के लिए बाबू और चौकीदार भी बाहरी रख दिया जाता है , पता नहीं 154 और 143 करवाते समय ये लोग अधिकारियों के सामने कौन सा मंत्र फूंकते है जो पढ़ा-लिखा अधिकारी अपनी आँखों को मूँदकर इनके पक्ष में आदेश पारित कर देता है ।

हीरा सिंह अधिकारी जी


4 comments:

  1. यही चीजें रोकनी है मिलकर सभी उत्तराखंडवासियों ने।

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  2. Bilkul shi kaha , awaaj do hum ek h

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  3. 🙏🙏❤❤❤❤💐💐

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उत्तराखण्ड में भू कानून की आड़ में क्या चल रहा है खेल

बिना दाँत के व्यक्ति को अगर गन्ना चूसने के लिए दे दिया जाए तो उसकी हालत शायद वैसी ही होगी जैसे कमजोर भू-क़ानून के साथ किसी राज्य की होती है,...