मैं बात कर रहा हूं, भारतवर्ष के पवित्र स्थानों में से एक बद्रीनाथ जी की गोद में बसे हुए सुंदर एवं रमणीक "माणा" गांव की। यह गांव उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है और यह भारत की सीमा का अंतिम गांव है। इस गांव का नाम भगवान शिव के भक्त मणिभद्र के नाम से पड़ा है,यहां से 55 किलोमीटर आगे चाइना बॅाडर लग जाता है।
यहां अधिकतर भोटीया जन जाति रहती है, वर्ष 2000 से पहले यहां के लोगों में काफी उत्सुकता और अपने काम के प्रति इनकी जागरूकता बहुत ही प्रभावशाली रहती थी, क्योंकि यहां के लोगों के पास भगवान की दी हुई प्रकृति के द्वारा अलौकिक रमणीयता अध्यात्म और पुरातन संस्कृति की अद्भुत कला एवं यंत्र विज्ञान है, जिससे इन लोगों का कार्य वहां के स्थलों को सही से बाहरी पर्यटकों को रूबरू कराना होता था। तिब्बत और माणा गांव वालों का व्यापार अधिक मात्रा में होता था। इस क्षेत्र की सबसे विश्वसनीय बात थी ये इन्टर नेशनल सीमा से सटा हुआ और प्रसिद्ध धामों में एक बद्रीनाथ धाम में स्थित है। पर जैसे-जैसे समय बीतता गया उत्तराखंड राज्य बना इसकी स्थिति और अच्छी होने के बजाय और बिगड़ती गयी, नाकाम सरकारों ने अपना डंडा चलाय धीरे-धीरे वहां के सभी कार्य शैली वहां के छोटे छोटे उद्योगों को बाहरी लोगों को सौंप दिया पैसों का लालच देकर। उन पैसों से दो चार दिन का खर्चा तो चला पर जैसे ही लोगों ने अपना हक मांगना चाहा सरकारों ने अपने सत्ता के जंजीरों का रास्ता दिखा दिया कोर्ट जाओ जिला अधिकारी पर जाओ बस आम आदमी भटकता रह गया, और सत्ता पर बैठे हूकुमत जादे अपनी रंगीन सियासत खिंचते चले गए।
पलायन कैसे हुआ ?
1- बात थी माणा गांव की वहां के उनी वस्त्रो गलीचो, कालीन,दन, शाल, इन सब हस्त कलाओं का बन्द होना , सरकारों की ग़लत नीतीयो की वजह से गांव के लोगों का वंहा से पलायन को मजबूर होना।
2- कृषि क्षेत्र में माणा सबसे आगे था परन्तु आज सबसे पीछे है। यहां के आलू आज भी विश्व विख्यात हैं यहां के लोग खेती में और खासकर आलू की पैदावार में बहुत कुशल हैं राजमा की दालें और फरण जिसकी खुशबू के दीवाने विदेशी भी हुआ करते थे इनकी पैदावार इतनी अधिक थी कि दूसरे राज्यों से लेने वालों को कतार में रहना पड़ता था परन्तु सत्ता के लालची लोगो नें इस क्षेत्र को उठाने के बजाय वंहा की जनजाती को पलायन पर मजबूर कर दिया है।
3- माणा जड़ी बूटियों का बादशाह है पर आज खाली हाथ है जडी बूटियां ऐसी की हर रोग का इलाज संभव है शारीरिक हो या मानसिक पुरानी हो या लम्बी बीमारी सभी असाध्य रोगों का इलाज है इनके पास। हनुमान जी इसी गांव के द्रोण गिरि पर्वत पर आये थे संजिवनी लाने यहां की “कीड़ा जड़ी” विश्व प्रख्यात हैं जिनकी डिमांड इंटरनेशनल बाजारों में करोड़ों में है पर निकम्मी सरकारों ने ये सब बाहरी लोगों के हवाले कर दिया है।
यहां के लोगो के पास इतना रोजगार था कि इनको पलायन करने की आवश्यकता ही नहीं थी बल्कि दूसरों को रोजगार देने की क्षमता इनके अंदर थी।
विशेष बद्रीनाथ मंदिर बंद होने पर भगवान बदरी नारायण को पहनाया जाने वाला घृत कंबल भी माणा की महिलाए ही तैयार करती हैं।
4- मुख्य बिन्दु में सबसे दूर्भाग्यपूर्ण योजना हम अपने क्षेत्रों में कोई भी निर्माण कोई भी उद्योग कैसे करें? कोई भी बाहरी आकर हमारे क्षैत्रो में होटल, रेस्टोरेंट ,भवन इत्यादि खोल देता है बाहरी लोगों को जमीन कैसे ये सरकार दे सकती है? बाहरी लोगो का यहां बसना और यहां के लोगों को बाहर का रास्ता दिखाना इससे बड़ा दुर्भाग्य उत्तराखंड का क्या हो सकता है? हम कहां जाएं? पर अब नही मखमल के गद्दो पर बैठ बैठकर हमारे उत्तराखंड का खून चूसने वालों सत्ताधारियों जनता अब बर्दाश्त नहीं करेंगी और यहां कि देवभूमि तुम्हें कभी माफ करेंगी अब समय आगया है कि हम सभी क्षेत्र हितैषी अपने-अपने क्षेत्रों को पहचानने की कोशिश करे और उसका सही श्रृंगार करने की पूरी तरह से समर्पित हो उठें।
उस पर पड़ी ये बाँधपरियोजनाओं की बड़े-बड़े होटलों की खननमाफियों की व्यसनी लोगो की बेड़ियों को तोड़ने की है। उसे सच में एक सुंदर, स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त देवभूमि उत्तराखंड बनाने की है। हां जब कोई हमसे पूछे कि आप कहां से हो तो हम गर्व से कह सके कि हम उस देवभूमि से हैं, जिसका वर्णन स्कन्द पुराण के केदार खंड में हुआ है, जैसा वहां लिखा है अभी भी बिल्कुल वैसा ही है ऐसा हमें महसूस हो।
प्रेषक- प्रदीप मैखुरी चमोली



उत्तम विचार प्रदीप जी। 💐🙏🏻
ReplyDeleteउत्तम विचार।। माणा गांव की तरह आज कई गांव वीरान हो रहे है समस्या एक ही एक पलायन।। इस गंभीर समस्या के लिए आज जागरूक होने की जरूरत है। एक साथ होने की जरूरत है
ReplyDeleteबहुत सुंदर विचार प्रदीप जी ये हमारा एक संकल्प है
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteबहुत ही उत्तम विचार है विगत वर्षों से उत्तराखंड में बहुत तेजी से पलायन हो रहा है जिन उद्देश्यों को लेकर उत्तराखंड का गठन हुआ था उन उद्देश्यों को किसी भी सरकार ने प्राथमिकता नहीं दी जिसके कारण आज उत्तराखंड बदहाल की स्थिति में है
ReplyDeleteअच्छा लिखा है और एक नई सोच के साथ उत्तराखंड के युवाओं आगे बढ़ना होग
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeletevery nice
ReplyDeleteआपने एकदम सच बात लिख दी है। ये सभी उत्तराखंड के लोगों की पीड़ा बया कर रहा है, जो किसी न किसी कारण वश अपनी जन्मभूमि को छोड़कर दूसरे अन्य राज्यों में चले गए। पर कही न कही आज भी वो दुःखी है, अपने जन्म स्थली के बिना यहाँ का वातावरण,सौन्दर्य,प्रकृति, तीर्थस्थल, यहाँ का व्यवहार इत्यादि उनको और किसी स्थान पर नहीं मिलता। पर क्या करे ये पेट की जठराग्नि ने मनुष्य के अंदर अनेक परिवर्तन ला दिए । यहाँ से जाने का निर्णय तब किया जब यहाँ की सरकारों ने कोई खास कार्य नहीं किया, रोजगार इत्यादि के लिये । आज भी ज्यादातर उत्तराखंड वासी अपने गांव में आना चाहते है, पर करेंगे क्या आके। आज भी यहाँ वही समस्याओं का पिटारा भरा पड़ा है। किसी भी राज्य की दुर्गति राज्य नेताओं के कारण होती है। चाहे आप भारत उन राज्यों की स्थिति देख सकते है। वहाँ के लोग आज भी बड़ी संख्या में अपने जन्म भूमि छोड़कर दूसरे स्थानों में दुःखी मन से रोजगार के लिए जाते है।
ReplyDeleteAchi soch hai .uttrakand vasiyon ko aage aana chahiy.Mana ganve mere dil ke karib hai.kuch sall phele mujh vaha jane ka moka mile.
ReplyDeleteपढ़े लिखे लोगों को आगे आना पड़ेगा।
ReplyDeleteजब आप जैंसे विद्काव वर्ग का साथ मिलेगा तो हम इस संगठन को बहुत मजबूत कर सकते हैं।
ReplyDeleteविद्वत् वर्ग
Deletehttps://www.youtube.com/watch?v=HU_NT_QFFjA
ReplyDeletehttps://www.youtube.com/watch?v=HU_NT_QFFjA
ReplyDeletehttps://www.youtube.com/watch?v=HU_NT_QFFjA
ReplyDeleteBhut sunder
ReplyDeleteउत्तराखंड के युवाओं का सहयोग और ग्रामीण क्षेत्रों का सहयोग मिलेगा तो संगठन के कार्यकर्ताओं
ReplyDeleteको कार्य करने का उत्साह बढ़ेगा।