सच कहूं तो मैं उत्तराखण्ड हूं । मेरा जन्म पर्यावरण से समृद्ध व सुसज्जित हिमालय की देख रेख और गंगा भागीरथी की उद्गमस्थली तथा बद्रीनाथ केदारनाथ गंगोत्री और यमुनोत्री इन चारों धामों की धामस्थली , कुम्भनगरी (हरिद्वार) सन्तनगरी (ऋषिकेश) संस्कृत ग्राम भन्तोला-बागेश्वर, किमोटा - चमोली तथा देवताओ की तपस्थली तपोवन ऋषिकेश और सरोवर नगरी नैनीताल एवं मन्दिरों की नगरी द्वारहाट -अल्मोडा के मध्य एक पर्वतीय राज्य के रूप में ०९/११/२००० को हुआ । मेरे जन्म के दिन यहां उत्तराखण्ड के लोगों में बहुत उत्साह था । मेरा राशि नाम तो उत्तराञ्चल है और प्रसिद्ध नाम उत्तराखण्ड है। मेरे जन्म लेते ही यहां के राज्यपाल के रूप में श्री सुरजीत सिंह बरनाला जी ने राज्य के प्रथम राज्यपाल होने का गौरव हासिल किया तथा प्रथम मुख्यमन्त्री के रूप में श्री नित्यानन्द स्वामी ने प्रथम मुख्यमन्त्री पद प्राप्त करने का गौरव प्राप्त किया।
अब सुनिये मेरी बचपन से लेकर इक्कीसवें वर्ष तक की करुण- वेदना मेरा बचपन कैसा था? मुझे पता ही नहीं चला और यदि सरकार ऐसे ही अनदेखी करेगी तो मेरी जवानी भी यूं ही चली जायेगी। आज मैं इक्कीसवें वर्ष में प्रवेश कर गया नेताओ के चक्कर में कुछ तरक्की तो की ही नहीं मैंने और कुछ समय बाद ऐसे ही बुढापा भी आ जायेगा । मेरे जन्म के लिए लोगों ने अनेक बलिदान दिये हैं (चाहे रामपुर तिराहा कांड हो चाहे सल्ट क्रान्ति हो) और और न जाने कितने लोग वीर गति को प्राप्त हुये उन वीर गति को प्राप्त हुये वीर पुरुषों और वीराङ्गनाओ की आत्मा क्या सोच रही होगी कि इसी कारण हमनें राज्य हेतु बलिदान दिया था आज जहां राजनेता अपनी कुर्सी बचाने में लगे हुये हैं और सुख सुविधाओ का भोग इस कदर कर रहे हैं कि उन्हें उत्तराखण्ड हेतु पृथक राज्य का जो सपना था उसका उद्देश्य क्या था इसको तो राजनेता भूल ही चुकें हैं।
आज उत्तराखण्ड की स्थिति यह है कि राजनेता अपनी महत्वकांक्षाओ की पूर्णता हेतु खुद तो पलायन कर गये और लोगों को भी पलायन की ओर विवश कर गये क्योंकि समाज समुदायों पर निर्भर होता है और समुदाय व्यक्तियों पर निर्भर होता है पुनः व्यक्ति समाज पर निर्भर होता है इस प्रकार कि चक्रीय प्रक्रिया चलती रहती है । परन्तु जब व्यक्ति ही नहीं होंगे तो समुदाय और समाज का निर्माण कैसे हो सकता है ? एक सफ़ल जीवन यापन करने के लिये मनुष्य को मूलभूत आवश्यकताओ (रोटी ,कपडा ,मकान ,शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार ) की आवश्यकता होती है अगर पहाडों में लोगों को इस प्रकार की मूलभूत सुविधाएं दी होती तॊ क्यों पहाड के लोग पलायन करने को विवश होते उत्तराखंड से पलायन का मूलभूत कारण यही की यहां के लोगों की दिनचर्या ही बदल दी । कहा हम पृथक राज्य देने के बाद आप लोगों की सारी सुविधाऒं का ख्याल रखेंगे कौन सा ऐसा राजनेता जिससे पहाड के विकास के लिऐ महत्वपूर्ण कदम उठाए हो केवल अपनी राजनीतिक कुर्सी बचाने हेतु कदाचित चुनाव के समय तो वह पहाड की ओर अपना रुख लेते हैं परन्तु चुनाव होते ही उनको कुर्सी मिल जाती है न जाने उस कुर्सी में क्या है जिस कुर्सी के चक्कर में लोग पहाड से मिले हुए अपने मतदाताओ का भी ध्यान नहीं रखते और अपना ध्यान रखने लग जाते हैं कहते हैं कि हम पलायन रोकेंगे और उत्तराखण्ड का सपना साकार करेंगे सच में वह सपना तो क्या साकार करते हैं लेकिन अपना जो उनका मूलभूत उद्देश्य होता है की अधिकाधिक धन अर्जन करना वह तो अवश्य पूरा हो जाता है कौन सा ऐसा नेता रहा हो उत्तराखण्ड का जिसने उत्तराखण्ड के विकास में पहाडी राज्यों में अत्याधिक विकास किया हो राज्य बनने के बाद राज्य की अस्थाई राजधानी देहरादून और स्थाई राजधानी गैरसैण इन २१ सालों में यही निश्चित नहीं हो पाया है कि उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी कब बनी भारत के किसी भी राज्य की अस्थाई राजधानी इतने लम्बे समय तक चली हो तो आप पता करिए हमारे उत्तराखण्ड में स्थाई राजधानी को ही स्थाई माना जाता है जब गैरसैण में राजधानी स्थापित होगी तो अधिकारी वर्ग और नेता बस समझ जाएंगे पहाड में जीवन यापन कितना कठिन होता है उनको तो बस देहरादून हल्द्वानी नैनीताल उधम सिंह नगर और हरिद्वार ही पसंद होते हैं इस कारण वह क्यों पहाडी राज्यों का विकास करेंगे और पहाडी जिलों में निवास करेंगे अगर वह लोग पहाडी जिल में निवास करते तो आज उत्तराखण्ड की ऐसी स्थिति नहीं होती जब उत्तराखण्ड के अधिकारी और नेता लोगों के बच्चे पहाडी जिलों के सरकारी विद्यालयों में अध्ययन करते या सरकारी राजकीय प्राथमिक माध्यमिक विद्यालयों में अध्ययन करते तो उन स्कूलों का विकास करते।
उनको तो जरुरत ही नहीं है तो वह क्यों करेंगे इन राज्यों के स्कूलों के विकास की परिचर्चा , उनको तो सिर्फ अपना फाइदा देखना होता है। सभी लोग पढे लिखे नहीं होते हैं यह भी सभी जानते हैं पर यह भी तो जानते ही हैं कि अपने अपने हिसाब से सभी को रोजगार तो मिलना ही चाहिये । अगर सभी लोग अफसर ही बन जायेंगे तो कृषि कार्य करेगा कौन ? और कैसे होगी सभी की उदर की पूर्ति ? तो इस काम के लिये आवश्यकता समय तथा समय के हिसाब से रोजगार के अवसर उपलब्ध करना होता है जैसे बागवानी करना फ़ल सब्जी का कार्य करना
कृषि क्षेत्र का विकास अपने अपने तरीके से किया जाता तो क्यों होते उत्तराखण्ड के लोग पहाडो से पलायन को विवश ? आंकडे बताते हैं कि जब से उत्तराखण्ड राज्य बना है तभी से पलायन ज्यादा हुआ है , तो इसमें जिम्मेदार कौन है ? तू क्या इसीलिए बना था पृथक राज्य उत्तराखण्ड ? अगर उत्तराखण्ड के निवासियों को अपने घर में ही रोजगार के मूल भूत अवसर दिये जाते तो क्यों वहां के लोग पलायन को विवश होते अभी भी समय है पहाडी जिलों का विकास किया जाय और वहां की शैक्षणिक गतिविधि को सुधारा जाय क्यों कि आज भी मूल भूत आवश्यकता यही है कि अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान की जाय ।




वाह सन्तोष जी गागर में सागर भर दिया आपनें। इस गूगल पेज को फोलो अवश्य करना।
ReplyDeleteवाह सन्तोष जी गागर में सागर भर दिया आपनें। इस गूगल पेज को फोलो अवश्य करना।
ReplyDeleteबहुत सुंदर संतोष जी💐💐 उत्तराखंड के विगत 20 वर्षों को सारांश रूप में आपके लेख में समाहित किया गया है।
ReplyDeleteअपना उत्तराखंड याद रखना इस धरती पर बहुत से महान लोगो ने जन्म लिया और तपस्या की। पर आज उत्तराखंड का जनमानस पलायन की ओर बढ़ रहा ही जो की बहुत ही निराशा जनक ही । आज इतनी प्राकृतिक संसाधन होते हुए भी हम लोग प्रकृति का एक हिस्सा का प्रयोग भी अपने जीवन में करना सुरु कर से तो शायद पलायन की नौबत न आए । एक अच्छा उदाहरण बाबा राम देव बाल कृण । हमारी उस प्रकृति की संपदा से ही आज भारत के धनाढ्य में गिने जाते है । जागो उत्तराखंडी ।
ReplyDeleteप्रदेश की पीड़ा को इतने सुंदर तरीके से बया करना, आपकी सुंदर मानसिकता का प्रदर्शन हैं!!
ReplyDeleteअति सुंदर......🌹🙏🌹
बहुत सुंदर 👌👌👌👌🙏
ReplyDeleteबहुत सुन्दर लेख
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