पलायन शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है जब कोई व्यक्ति अच्छे रोजगार अच्छे स्वास्थ्य अच्छी शिक्षा के लिए एक जगह से दूसरी जगह पर जाए तो उसे पलायन कहते हैं। .
आज हम उत्तराखंड पलायन के ऊपर बात करने वाले हैं क्योंकि अब उत्तराखंड का पलायन केवल राजनीतिक मुद्दा मात्र नहीं रह गया है यह अब एक लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ भी बन चुका है क्योंकि धीरे-धीरे पहाड़ों की जो संस्कृति है वह भी अब धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर है।
एक नए उत्तराखंड बनाने का जो सपना था वह सपना इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द था कि कैसे हम जो उत्तर प्रदेश की विकास योजनाएं हैं उन्हें पहाड़ों के दूरदर्शी गांव में भेज सकें ताकि यहां के लोगों को अपने रोजगार के लिए बाढ़ शहरों की तरफ ना जाना पड़े। लेकिन आज हकीकत आप सब लोगों के सामने है।
उत्तराखंड में पलायन की समस्या दिनों-दिन विकराल रूप धारण कर रही है, जिससे साल दर साल गांव के गांव वीरान हो रहे हैं। पिछले दस साल से हर दिन औसतन 33 लोग गांवों से जा रहे हैं। यह खुलासा खुद राज्य सरकार की रिपोर्ट में हुआ है
1-उत्तराखंड पलायन आंकड़ों की दृष्टि से
वर्ष 2011 से राज्य से बाहर प्रवास करने वाले कुल 5,02,707 लोगों में से, टिहरी जिले से सबसे अधिक 89,830 लोगों के साथ पलायन हुआ, इसके बाद पौड़ी (73072), 69818 अल्मोड़ा जिले, चमोली (46290), पिथौरागढ़ (41669), रुद्रप्रयाग से आए। 30570), बागेश्वर (29300), देहरादून (28,583), चंपावत (28218), नैनीताल (25774), उत्तरकाशी (22620), हरिद्वार में कुल 9312 लोग और ऊधम सिंह नगर (7016)।
SRDMC द्वारा पिछले साल मई में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, उनमें से लगभग 50% आजीविका की तलाश में चले गए थे। उत्तराखंड में करीब 16,500 गांव हैं, जिनमें से 734 'भूत गांव' बन गए हैं।
2 पलायन रोकने में नाकाम सरकार-
हमारी सरकार पलायन रोकने में हर मुद्दे पर विफल साबित हुई है उत्तराखंड राज्य में विकास को केवल कुछ शहरों तक सीमित कर दिया गया है उत्तराखंड में अभी तक जितनी भी सरकारें आई हैं उन्होंने गांव की तरफ रोजगार को बढ़ाने के लिए ध्यान नहीं दिया है।
प्रदेश में सत्तासीन सरकारें पहाड़ में सड़क, चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार आदि मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाई हैं। पलायन रोकने के लिए गठित पलायन आयोग की संस्तुतियां फाइलों तक सीमित हैं। पर्वतीय क्षेत्र में मूलभूत सुविधाएं और रोजगार के साधन उपलब्ध कराने, लोगों को जल जंगल, जमीन संबंधी अधिकार देने के साथ ही हिमाचल प्रदेश के विकास के मॉडल को आदर्श मानते हुए उसे अपनाना चाहिए!
3-पलायन रोकने में संगठनों की भूमिका
हम केवल लोगों को यह नहीं कह सकते कि आप वापस उत्तराखंड आइए पहले हमें उन्हें रोजगार के कुछ साधन मुहैया कराने पड़ेंगे हमें हमारी जो कुछ योजनाएं हैं उनके बारे में उन्हें अवगत कराना पड़ेगा उन्हीं में से कुछ योजनाएं निम्नलिखित हैं-
(a) होम स्टे योजना
क्योंकि उत्तराखंड पर्यटन राज्य है इस कारण हमारे युवाओं को इस योजना के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी होनी चाहिए-
पलायन रोकने और स्वरोजगार व पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से होम स्टे योजना संचालित की गई है। पर्यटन विभाग की ओर से दीनदयाल उपाध्याय योजना के तहत पर्वतीय क्षेत्रों में 33 प्रतिशत और मैदानी क्षेत्रों में 25 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है। जोशीमठ के सुनील गांव निवासी नितिन सेमवाल पिछले दो सालों से होम स्टे का संचालन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि एक वर्ष में होम स्टे से करीब पचास हजार तक कमा लेते हैं।
(b) मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना-
इस कार्यक्रम के तहत आवेदन करने वाले प्रवासियों को संबंधित अधिकारियों से त्वरित स्वीकृति मिल जाएगी और उनके आवेदन तत्काल सब्सिडी के साथ बैंकों को अग्रेषित किए जाएंगे जो पहाड़ी जिलों में 25% और मैदानी जिलों में 15% होगी।इस परियोजना का उद्देश्य युवाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान करना और रिवर्स माइग्रेशन को बढ़ावा देना है
अभिषेक पाण्डेय
गढकुमाऊँ संगठन कार्यकर्ता


बहुत सुंदर विचार👍💐
ReplyDeleteमात्र विचारों के आदान प्रदान सें ही कुछ तथ्य हमारे सामने ऐसे आ जायेंगे, जिससे अगर कोई बेरोजगार युवा किसी भी रोजगार के प्रति कार्य करना चाहें तो उन्हें ईसी प्लेटफार्म के माध्यम से एक दिशा मिल जायेगी!!
ReplyDeleteइसलिए बहुत जरूरी हैं कि युवा वर्ग संगठन से जुड़े और दूसरों को भी जागृत करें!!
होम स्टे योजना का बहुत ही अच्छा विकल्प है।
ReplyDeleteपर्यटन उद्योग के लिए आवश्यक संसाधन विकसित करने के लिए इन योजनाओं में कोई भी ब्लू प्रिंट नहीं है। केवल पर्यटन उद्योग के सहारे उत्तराखंड का विकास संभव नहीं है। पर्यटन उद्योग एक छोटा माध्यम हो सकता है। परन्तु केवल पर्यटन उद्योग से उत्तराखंड के विकसित होने और पलायन जैसी समस्या का समाधान संभव नहीं है।
ReplyDeleteपलायन को रोकने के लिए किसी भी राज्य को नागरिकों की मूल भूत आवश्यकताओं के लिए मूलभूत ढांचा विकसित करना पड़ता है। संपोषित विकास ही पलायन को रोक सकता है। स्वरोजगार एक बहुत बढ़िया विचार है, परन्तु स्वरोजगार को एक संस्थान की भावना से देखा जाना जरूरी है। उत्पादन और खपत के मूलभूत सिद्धांत पर आधारित रोजगार योजनाओं पर गंभीर विचार विमर्श की जरूरत है। तत्कालीन सरकार की स्वरोजगार योजना केवल आंखों में धूल झोंकने जैसी है। इस तरह की योजनाओं से एक ही प्रकार के स्वरोजगार के प्रत समझ विकसित होती है को की अंत में असफल रोजगार का कारण बन रही है। मूलभूत ढांचे के बिना यह सभी योजनाएं सिर्फ जुमले है, जो युवाओं को भ्रमित कर उनका वोट हासिल करने का षड्यंत्र मात्र हैं।
ReplyDeleteबहुत सुंदर विचार 🙏🙏🌹
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