Friday, 16 July 2021

हरेला पर्व 2021: कुमाऊँ में धूमधाम से मनाया जाता है यह पर्व

हरेला एक हिंदू त्यौहार है जो मूल रूप से उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में मनाया जाता है । हरेला पर्व वैसे तो वर्ष में तीन बार आता है, परन्तु सर्वाधिक धूम-धाम से सूर्य का कर्क राशि में प्रवेश के समय श्रावण मास की प्रथम गते जिसको हम संक्रान्ति भी कहते हैं, अर्थात अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार जुलाई मास के मध्य में यह त्यौहार मनाया जाता है।

जिस प्रकार से हम नवरात्रों का पूजन करते हैं और नवरात्रों में प्रतिपदा अर्थात् प्रथम नवरात्रे को हरियाली बो देते हैं और नवमी के दिन उसको पूजन करके काट दिया जाता है ठीक उसी प्रकार से हरेला में भी श्रावण मास लगने से नौ दिन पूर्व हरियाली को बो देते हैं और जिस दिन कर्क संक्रान्ति होती है अर्थात श्रावण मास का प्रथम दिन होता उस दिन हरियाली को काट दिया जाता है। 


इसके तीन प्रकार-

1- चैत्र मास में – चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हरियाली बोयी जाती है और नवमी को काटी जाती है।

2- श्रावण मास में - श्रावण मास प्रारम्भ होने से नौ दिन पहले आषाढ़ मास में हरियाली को बोया जाता है और नौ दिन बाद श्रावण मास के प्रथम दिन काटा जाता है।

3- आश्विन मास में - आश्विन मास में प्रथम नवरात्रे के पहले दिन हरियाली बोयी जाती है और नवमी के दिन हरियाली काटी जाती है।

सनातन सभ्यता में जितने भी व्रत पर्व त्यौहार इत्यादि आते हैं वह सब प्रकृति का सूचांक माना जाता है। जैसे - 

चैत्र व आश्विन मास में बोयी जाने वाली हरेला मौसम के बदलाव के सूचक है।

चैत्र मास में बोया/काटा जाने वाला हरेला ग्रीष्म ऋतु के आगमन की सूचना देता है।

तो वहीं पर आश्विन मास में बोयी जाने वाली हरेला शिशिर ऋतु के आगमन की सूचना देता है।

लेकिन श्रावण मास में मनाये जाने वाला हरेला पर्व का सामाजिक रूप से अपना विशेष महत्व है, तथा समूचे कुमाऊँ में इसे अति महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक माना जाता है। जिस कारण इस अन्चल में यह त्यौहार अधिक धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

जैसा कि हम सभी को विदित है कि श्रावण मास भगवान भोलेशंकर का प्रिय मास है, इसलिए हरेला के इस पर्व को कहीं कहीं हर-काली के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि श्रावण मास शंकर भगवान जी को विशेष प्रिय है। यह तो सर्वविदित ही है कि उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और पहाड़ों पर ही भगवान शंकर का वास माना जाता है। 

इसलिए भी उत्तराखण्ड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला का अधिक महत्व है।  हरेला पर्व उत्तराखंड के अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश में भी हरियाली पर्व के रूप में मनाया जाता है।

हरियाली या हरेला शब्द पर्यावरण के काफी करीब है। ऐसे में इस दिन सांस्कृतिक आयोजन के साथ ही पौधारोपण भी किया जाता है। जिसमें लोग अपने परिवेश में विभिन्न प्रकार के छायादार व फलदार पौधे रोपते हैं।

सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूँ, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों को बो दिया जाता है।

 नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह को पानी छिड़कते रहते हैं। दसवें दिन इसे काटा जाता है। 4 से 6 इंच लम्बे इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है। घर के सदस्य इन्हें बहुत आदर के साथ अपने शीश पर रखते हैं। 

घर में सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में हरेला बोया व काटा जाता है। इसके मूल में यह मान्यता निहित है कि हरेला जितना बड़ा होगा उतनी ही फसल बढ़िया होगी। साथ ही प्रभू से फसल अच्छी होने की कामना भी की जाती है।

इस दिन कुमाऊँनी भाषा में गीत गाते हुए छोटों को आशीर्वाद दिया जाता है –

जी रये, जागि रये, तिष्टिये, पनपिये,

दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइये,

हिमाल में ह्यूं छन तक, गंग ज्यू में पांणि छन तक,

यो दिन और यो मास भेटनैं रये, अगासाक चार उकाव, धरती चार चकाव है जये,

स्याव कस बुद्धि हो, स्यू जस पराण हो।”

जी राय, जागि राय यो दिन बार भेटने राये स्याव जस बुद्धि है जो। बल्द जस तराण हैं जो। दुब जस पनपने राये। कफुवे जस धात हैं जो। पाणी वाई पतौउ हैं जो।

आफू सब ईष्ट मित्रों कै उत्तराखण्डी लोकपर्व हरयाव क हार्दिक बधाई छ। हमर कुमाऊनी संस्कृति हमर पच्छ्याण।


3 comments:

  1. हरेला पर्व की सभी छोटा बड़ा भूला बैण्यू तै सादर शुभकामनाएँ

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  2. बहुत अच्छा शब्द पिरोए हे उत्तराखंड के श्रावण मास के सक्रांति एब हरेला की पवन बेला पर बहुत खूब
    सबू उत्तराखंड वासियों ते हार्दिक शुभकामए

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  3. Jay Uttarakhand 🙏🙏🙏❤❤❤

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