माना कि अतिवृष्टि एक प्राकृतिक आपदा का द्योतक है परन्तु उस प्राकृतिक आपदा को न्योता महत्त्वकांक्षी मानव ही दे रहा है। जब प्राकृतिक आपदाएं आती है तो सरकार द्वारा एक टीम गठित की जाती है जो हर समय सजग रहती है इस प्रकार की विषम परिस्थितियों से निपटने के लिए जिसको प्रशासन द्वारा संचालित किया जाता है। उसको हम आपदा प्रबन्धन टीम के नाम से जानते हैं।
इसी आपदा के चलते उत्तराखण्ड के हजारों की संख्या में गाँव मूलभूत सुविधाओं से कट चुके हैं। आज भी हजारों ग्राम सभाओं में पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है, आज भी हजारो ग्राम सभाएं विद्युत से वंचित हैं, आज भी हजारों ग्राम सभाओं की मुख्य सड़क मार्ग बाधित है।
इन्हीं समस्याओं के साथ आज गढकुमाऊँ संगठन उत्तराखण्ड की टीम ने टिहरी गढवाल जिले के कीर्तिनगर ब्लॉक में सुपांणा से धारी ग्राम सभा को जोड़ने वाले मार्ग जायजा लिया।
इस मार्ग का निर्माण प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत दो महीने पूर्व किया गया था। जिसके निर्माण कार्य की गुणवत्ता शून्य के बराबर थी। जब ग्रामीणों निर्माण के समय इसका विरोध किया तो यह रुका नहीं अपितु कार्य फिर भी द्रुत गति से चलता रहा परन्तु बनाने वाले बुद्धीजीवी वर्ग ने ये नहीं सोचा कि भविष्य में इसी मार्ग से लोगों का आवागमन होगा तो क्या होगा ।
समय दो महीने का बीता ही था कि उत्तराखण्ड में अति वृष्टि हो गई और इस मार्ग की पोल खुल गई। यह सड़क इतनी ज्यादा क्षतिग्रस्त हुई कि आज प्रशासन भी सोचने पर विवश हो गया है।
ग्राम प्रधान धारी से सोहन प्रसाद पाण्डेय लगातार प्रशासन से वार्तालाप करने में लगे हुए हैं परन्तु प्रशासन का वही गोल मोल रवय्यों के आगे व्यवस्था दम तोड़ती दिख रही है। ग्रामीणों के वाहन जिससे उनकी रोजी रोटी चल रही थी पिछले बीस दिनों से ठप पड़े हुए हैं क्योंकि मार्ग की खबर लेने वाला कोई नहीं है।
आज गढकुमाऊँ संगठन के कार्यकर्ता अरुण भट्ट, अंकित जुगराण, अतुल पाण्डेय, शागर पाण्डेय तथा डॉ. नवीन पाण्डेय ने कुछ स्थानों पर स्वयं से पत्थर हटाकर मार्ग को खोलने का कार्य किया है परन्तु कुछ जटिल और बड़े पत्थरों को हिलाना सम्भव नहीं हो सका वह केवल मशीन द्वारा ही हटाए जा सकते हैं।
भूस्खलन के पश्चात् ग्राम सभा धारी के गंडासू तोक के पैंसठ वर्षीय श्रीमान दिनेश पाण्डेय जी के गांव की जल व्यवस्था ठप पड़ी हुई थी जिसको दुरुस्त करने के लिए वह स्वयं से सौ मीटर की पहाड़ी चढ़ कर अपने लिए जल की व्यवस्था बनाने में लगे हुए हैं। इस बीच अगर उनको कुछ हो जाता है तो कोई पूछने वाला नहीं है।
अब आप स्वयं से आकलन कर सकते हैं कि कितना विकास हो रहा है पहाड़ों में?


















