Tuesday, 29 June 2021

उत्तराखण्ड में लगभग बीस दिन पहले हुई अति वृष्टि, अपने पीछे छोड़ गई कुछ दुखद निशान



माना कि अतिवृष्टि एक प्राकृतिक आपदा का द्योतक है परन्तु उस प्राकृतिक आपदा को न्योता महत्त्वकांक्षी मानव ही दे रहा है। जब प्राकृतिक आपदाएं आती है तो सरकार द्वारा एक टीम गठित की जाती है जो हर समय सजग  रहती है इस प्रकार की विषम परिस्थितियों से निपटने के लिए जिसको प्रशासन द्वारा संचालित किया जाता है। उसको हम आपदा प्रबन्धन टीम के नाम से जानते हैं। 

इसी आपदा के चलते उत्तराखण्ड के हजारों की संख्या में गाँव मूलभूत सुविधाओं से कट चुके हैं। आज भी हजारों ग्राम सभाओं में पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है, आज भी हजारो ग्राम सभाएं विद्युत से वंचित हैं, आज भी हजारों ग्राम सभाओं की मुख्य सड़क मार्ग बाधित है। 

इन्हीं समस्याओं के साथ आज गढकुमाऊँ संगठन उत्तराखण्ड की टीम ने टिहरी गढवाल जिले के कीर्तिनगर ब्लॉक में सुपांणा से धारी ग्राम सभा को जोड़ने वाले मार्ग जायजा लिया।



इस मार्ग का निर्माण प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत दो महीने पूर्व किया गया था। जिसके निर्माण कार्य की गुणवत्ता शून्य के बराबर थी। जब ग्रामीणों निर्माण के समय इसका विरोध किया तो यह रुका नहीं अपितु कार्य फिर भी द्रुत गति से चलता रहा परन्तु बनाने वाले बुद्धीजीवी वर्ग ने ये नहीं सोचा कि भविष्य में इसी मार्ग से लोगों का आवागमन होगा तो क्या होगा ।

समय दो महीने का बीता ही था कि उत्तराखण्ड में अति वृष्टि हो गई और इस मार्ग की पोल खुल गई। यह सड़क इतनी ज्यादा क्षतिग्रस्त हुई कि आज प्रशासन भी सोचने पर विवश हो गया है। 



ग्राम प्रधान धारी से सोहन प्रसाद पाण्डेय लगातार प्रशासन से वार्तालाप करने में लगे हुए हैं परन्तु प्रशासन का वही गोल मोल रवय्यों के आगे व्यवस्था दम तोड़ती दिख रही है। ग्रामीणों के वाहन जिससे उनकी रोजी रोटी चल रही थी पिछले बीस दिनों से ठप पड़े हुए हैं क्योंकि मार्ग की खबर लेने वाला कोई नहीं है।

आज गढकुमाऊँ संगठन के कार्यकर्ता अरुण भट्ट, अंकित जुगराण, अतुल पाण्डेय, शागर पाण्डेय तथा डॉ. नवीन पाण्डेय ने कुछ स्थानों पर स्वयं से पत्थर हटाकर मार्ग को खोलने का कार्य किया है परन्तु कुछ जटिल और बड़े पत्थरों को हिलाना सम्भव नहीं हो सका वह केवल मशीन द्वारा ही हटाए जा सकते हैं।



भूस्खलन के पश्चात् ग्राम सभा धारी के गंडासू तोक के पैंसठ वर्षीय श्रीमान दिनेश पाण्डेय जी के गांव की जल व्यवस्था ठप पड़ी हुई थी जिसको दुरुस्त करने के लिए वह स्वयं से सौ मीटर की पहाड़ी चढ़ कर अपने लिए जल की व्यवस्था बनाने में लगे हुए हैं। इस बीच अगर उनको कुछ हो जाता है तो कोई पूछने वाला नहीं है।

अब आप स्वयं से आकलन कर सकते हैं कि कितना विकास हो रहा है पहाड़ों में?

Wednesday, 23 June 2021

सरकार हमारी सुनना नहीं चाहती तो हमें इच्छामृत्यु दे दे- एक उत्तराखण्डी का खुला पत्र

आज मैं आपको उत्तराखण्ड  के जनपद रुद्रप्रयाग के विकाश खण्ड अगस्त्यमुनि के अन्तर्गत पलायन की मार झेल रहे, ग्राम पंचायत कान्डा-सिमतोली के सिमतोली गाँव से अवगत करवाता हूं। हमारे गाँव में लगभग 80% परिवार पलायन कर चुके हैं ओर अब गाँव में गरीब बेबश लोग ही पहाड़ों के इस सुंदर गांव में रह रहे हैं। केवल चार परिवार गाँव में रहते हैं, उनमें भी गिनती के 10 लोग हैं। उन में भी एक दो बुजुर्ग के अलावा बाकी सब महिला ही यहाँ रहते है। सरकार पलायन रोकने के लिये बहुत सारी योजनाएं बना रही है लेकिन हकिकत कुछ ओर ही है, मैं समझता हूं कि वो लोग ही सही करते हैं जो इन पहाड़ों को छोड़ कर जा रहे हैं। क्योंकि जिन गांवो में पलायन हुआ है वहाँ किसी का भी ध्यान नहीं जाता। किसी भी राजनेता, जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत के सदस्य या  सरकार के किसी भी अधिकारी या सरकारी विभाग के कर्मचारी का। हर किसी के जुवान में एक ही बात होती की वहाँ तो बहुत कम लोग रहते हैं।




मैं आजतक नहीं समझ पाया कि, क्या जो लोग वहाँ हैं उनको भी वहाँ नहीं रखना चाहते सरकारी कर्मचारी? क्या उन लोगों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा जायेगा, वो भी केवल इसलिए कि वहां लोगों की संख्या कम है। क्या संख्या का कम होना किसी गांव के अस्तित्व को खत्म कर देता है? ऐसी स्थिति में किसे दोष दें कौन दोषी है?  वही लोग जो अपनी लाचारी बेबसी गरीबी के कारण अन्यत्र जमीन ले के घर नहीं बना पाते। 

मैं अपने गाँव की बात करुँ तो हमारे यहाँ पर जब कभी पानी टूट जाता है तो 10-10 दिनों तक पानी ही नहीं आता, कभी लाईट खराब हो जाये तो लाईनमेन को हाथ जोड़ते-जोड़ते 10 दिन का टाईम लग जाता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि हमारे गाँव में जब लगभग पूरा गाँव पलायन कर चूका है तब जाके मोटर मार्ग की स्वीकृति हुई, ओर 2 महिने पहले कार्य भी हुआ, लेकिन सड़क बनने से पुराने पैदल मार्ग पूर्णरुप से क्षतिग्रस्त हो गये। खैर मोटर मार्ग की खुशी थी तो ये सब भी कोई बात नहीं लेकिन बरसात शुरु होते ही सड़क पूरी तरह टूट गयी उस पर पैदल चलना भी मुश्किल हो गया। अब गाँव वालों के पास अन्य कोई भी रास्ता नजदीकी बाजार जाने के लिये नहीं है। ग्रामीणों ने सबंधित विभाग के ठेकेदार से सम्पर्क भी किया पर बात वही कि वहां के चार लोग हमारा क्या बिगाड़ लेंगे, इस प्रकार की विचार धारा लिये हूए कोई भी व्यक्ति हमारी समस्या कैसे सुनेगा, या हमारी बात सरकार तक कैसे पहुंचेगी। 



आज एक हफ्ता होने को आया है लेकिन रास्ता नहीं बना, 14 जून को लाईट खराब हो गयी थी अभी तक नहीं बनी। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति अचानक बीमार हो जाता तो कैसे उसको उपचार के लिये ले जायेंगे पहले ही गाँव की क्या स्थिति है वो मैने आपको बता दी है। 

उत्तराखंड में इस प्रकार के जितने भी गाँव हैं वहाँ के लगभग यही हाल है। क्योंकि सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि ऐसे गांवों में वोटर भी नहीं होते इसलिए कोई भी नेता चाहे वो उस ग्राम सभा का प्रधान ही क्यों ना हो ऐसे गांवों पर ध्यान नहीं देता, अब आप ही बतायें कि हम जैसे लोग अपना दुख किसे बतायें।

सरकार से यदि कुछ नहीं होता तो पलायन हो चुके गाँवो में जहाँ असमर्थ लोग ही बहुत कम संख्या में रह रहें हैं उन लोगों को इच्छामृत्यु दे देनी चाहिए। या फिर हर घर तक सुविधा पहुंचाने की बात को केवल कागजों तक सीमित न रखकर जन-जन तक पहुंचाना चाहिए। हालांकि यह एक सुनहरा ख्वाब लगता है बस। 

कैलाश देवली

Sunday, 20 June 2021

एक ही बरसात ने खोल दी पोल



उत्तराखण्ड में बीते 2 दिन में अतिवृष्टि के कारण नदी नाले उफान पर दिखे। इसी कड़ी में उत्तराखण्ड की टिहरी जनपद, कीर्तीनगर ब्लॉक से सुपाणा और ग्राम सभा धारी को जोड़ने वाली साढ़ेसात किलोमीटर रोड निर्माणाधीन होते हुए दो बरसातों में क्षतिग्रस्त हो गई। 



यह रोड बोर्डर रोड एनएच 58 से लिंक होते हुए ग्राम सुपाणा, ग्राम गंडासू, मेहर गांव होते हुए धारी ग्राम तक के लिए प्रस्तावित थी, लेकिन भ्रष्टाचार के कारण आज सड़क पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। यह रोड प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत बन रही थी।





धारी ग्राम सभा और गंडासूं गांव के लोग विधायक महोदय विनोद कंडारी जी से पूछना चाहते हैं कि, इसकी क्या वजह है। अभी बरसात की शुरुआत ही हुई है और सड़क के बुरे हाल हो गए हैं। सड़क ने विकास कार्यों की पोल खोल दी है। आखिर कब तक जनता के टेक्स से ऐसे काम होते रहेंगे। क्या जनता विकास की बातों को बस सुनती ही रहेगी। 

Tuesday, 15 June 2021

गढ़कुमाऊँ संगठन के जिला प्रतिनिधि विनोद राणा की पहल पर स्वास्थ्य टीम ने गांव में जाकर लगाई वैक्सीन





गढ़कुमाऊँ संगठन उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग जिला प्रतिनिधि विनोद सिंह राणा ने एक ऐसा उदाहरण समाज के सामने पेश किया है जिससे हर कोई सीख ले सकता है। बात मद्महेश्वर घाटी के अंतिम गांव गौडांर की है। यह गांव मुख्य सड़क से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर है और वैक्सीनेशन के लिए इस गांव के लोग 6 किलोमीटर चलने के लिए बाध्य थे। युवा लोगों के लिए तो शायद यह बड़ी समस्या नहीं है लेकिन गांव के बुजुर्गों के लिए यह बहुत कठिन कार्य था। ऐसे में कालीमठ वार्ड के जिला पंचायत सदस्य विनोद राणा ने अपने प्रयासों से स्वास्थ्य टीम को गांव में जाकर वैक्सीनेशन का कार्य पूरा करने के लिए प्रेरित किया। 




इसके बाद स्वास्थ्य टीम गांव में पहुंची और लोगों को वैक्सीन लगाई। विनोद राणा जी बताते हैं कि, गांव में प्रत्येक बुजुर्ग को वैक्सीन लगाई गई है। वैक्सीनेशन का कार्य समाप्त होने के बाद गांव के लोगों ने स्वास्थ्य टीम के प्रति आभार प्रकट किया। उत्तराखण्ड में ऐसे ही व्यक्तित्व की आवश्यकता है जो अपने हितों से ऊपर उठकर समाज के लिए कार्य करें।



साथ ही साथ विनोद राणा जी ने सभी क्षेत्रवासियों से आग्रह किया है कि आप सभी क्षेत्रवासी गढकुमाऊँ संगठन उत्तराखण्ड से जुडिए और अपना जंगल, अपनी जमीन एवं अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए आगे आइए। क्योंकि दिल्ली से रिमोट कन्ट्रोल वाली सत्ता केवल आपको लूटने आएगी परन्तु क्षेत्रीय संगठन गढकुमाऊँ सदैव आपके साथ रहेगा।

Sunday, 13 June 2021

गढ़कुमाऊँ संगठन की मीटिंग में संगठन को मजबूत करने के लिए कार्यकर्ताओं ने रखी यह महत्वपूर्ण बातें


गढ़कुमाऊं संगठन उत्तराखंड में दिनांक 13 जून 2021 को संगठन के विस्तारीकरण को लेकर चर्चा हुई । जिसमें संगठन से जुड़े सम्मानित सदस्यों ने संगठन को विस्तृत कैसे किया जाय इस पर अपने विचार दिए जो कि काफी सरहानीय थे।

मीटिंग के मुख्य बिंदु निम्न थे-

पहला- सभी सदस्यों ने इस बात पर अपनी सहमति जताई कि इस आपातकालीन स्तिथि में हम किस प्रकार से सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, व्हाट्सप्प, ट्वीटर आदि के माध्यम से विस्तारीकरण करना चाहिये।

दूसरा- किसी भी समाज मे शिक्षक सबसे अहम भूमिका निभाता है , समाज का वर्तमान और भविष्य का निर्माणकर्ता शिक्षक को माना जाता है। सदस्यों ने यह निर्णय लिया कि शिक्षकों के माध्यम से हम इस जन चेतना में विस्तार ला सकते है।

तीसरा- समाज मे भाईचारा बढ़ाकर तथा महिला शक्ति को इस विचारधारा से अवगत करा कर हम विस्तारीकरण की प्रकिया को कर सकते है ।

चौथा- सदस्यों द्वारा इस बात पर भी चर्चा की गई कि छोटे छोटे सामाजिक कार्यों के माध्यम से , समाज के बीच मे जा कर के, उनकी समस्याओं को सुन कर हम समाज के हर व्यक्ति से दिल से जुड़ सकते है।

पांचवा- संगठन के कार्यकर्ताओं को कार्यो के प्रति सजगता से ,लोगो की समस्याओं से जुड़ कर भी यह कार्य किया जा सकता है

सभी महानुभावो ने संगठन के विस्तारीकरण को लेकर जो भी आशावान विचार दिए वो सभी विचारणीय है। और संगठन की मजबूती में मील के पत्थर साबित होंगे

सभी सदस्यों के विचारों का मैं संगठन की और से हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन करता हूँ

धन्यवाद🙏💐

कार्यकर्ता- शुभम

गढ़कुमाऊं संगठन उत्तराखंड

Wednesday, 9 June 2021

मैं उत्तराखण्ड हूं



सच कहूं तो मैं उत्तराखण्ड हूं । मेरा जन्म पर्यावरण से समृद्ध व सुसज्जित हिमालय की देख रेख और गंगा भागीरथी  की उद्गमस्थली तथा बद्रीनाथ केदारनाथ  गंगोत्री और यमुनोत्री इन चारों धामों की धामस्थली , कुम्भनगरी (हरिद्वार) सन्तनगरी (ऋषिकेश) संस्कृत ग्राम भन्तोला-बागेश्वर, किमोटा - चमोली तथा देवताओ की तपस्थली तपोवन ऋषिकेश और सरोवर नगरी नैनीताल एवं मन्दिरों की नगरी द्वारहाट -अल्मोडा के मध्य एक पर्वतीय राज्य के रूप में ०९/११/२००० को हुआ । मेरे जन्म के दिन यहां उत्तराखण्ड के लोगों में बहुत उत्साह था । मेरा राशि नाम तो उत्तराञ्चल है और प्रसिद्ध नाम उत्तराखण्ड है। मेरे जन्म लेते ही यहां के राज्यपाल के रूप में श्री सुरजीत सिंह बरनाला जी ने राज्य के प्रथम राज्यपाल होने का गौरव हासिल किया तथा प्रथम मुख्यमन्त्री के रूप में श्री नित्यानन्द स्वामी ने प्रथम मुख्यमन्त्री पद प्राप्त करने का गौरव प्राप्त किया। 



अब सुनिये मेरी बचपन से लेकर इक्कीसवें वर्ष तक की करुण- वेदना मेरा बचपन कैसा था? मुझे पता ही नहीं चला और यदि सरकार ऐसे ही अनदेखी करेगी तो मेरी जवानी भी यूं ही चली जायेगी। आज मैं इक्कीसवें वर्ष में प्रवेश कर गया नेताओ  के चक्कर में कुछ  तरक्की तो की ही नहीं मैंने और कुछ समय बाद ऐसे ही बुढापा भी आ जायेगा । मेरे जन्म के लिए लोगों ने अनेक बलिदान दिये हैं (चाहे रामपुर तिराहा कांड हो चाहे सल्ट क्रान्ति हो) और और न जाने कितने लोग वीर गति को प्राप्त हुये उन वीर गति को प्राप्त हुये वीर पुरुषों और वीराङ्गनाओ की आत्मा क्या सोच रही होगी कि इसी कारण हमनें राज्य  हेतु बलिदान दिया था आज जहां राजनेता अपनी कुर्सी बचाने में लगे हुये हैं और सुख सुविधाओ का भोग इस कदर कर रहे हैं कि उन्हें उत्तराखण्ड हेतु पृथक राज्य का जो सपना था उसका उद्देश्य क्या था इसको तो राजनेता भूल ही चुकें हैं। 





आज उत्तराखण्ड की स्थिति यह है कि राजनेता अपनी महत्वकांक्षाओ की पूर्णता हेतु खुद तो पलायन कर गये और लोगों को भी पलायन की ओर विवश कर गये क्योंकि समाज समुदायों पर निर्भर होता है और समुदाय व्यक्तियों पर निर्भर होता है पुनः व्यक्ति समाज पर निर्भर होता है इस प्रकार कि चक्रीय प्रक्रिया चलती रहती है । परन्तु जब व्यक्ति  ही नहीं होंगे तो समुदाय और समाज का निर्माण कैसे हो सकता है ? एक सफ़ल जीवन यापन करने के लिये मनुष्य को मूलभूत आवश्यकताओ (रोटी ,कपडा ,मकान ,शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार ) की आवश्यकता होती है अगर पहाडों में  लोगों को इस प्रकार की मूलभूत सुविधाएं दी होती तॊ क्यों पहाड के लोग पलायन करने को विवश होते उत्तराखंड से पलायन का मूलभूत कारण यही की यहां के लोगों की दिनचर्या ही बदल दी । कहा हम पृथक राज्य देने के बाद आप लोगों की सारी सुविधाऒं का ख्याल रखेंगे कौन सा ऐसा राजनेता जिससे पहाड के विकास के लिऐ महत्वपूर्ण कदम उठाए हो केवल अपनी राजनीतिक कुर्सी बचाने हेतु कदाचित चुनाव के समय तो वह पहाड की ओर अपना रुख लेते हैं परन्तु चुनाव होते  ही उनको कुर्सी मिल जाती है न जाने उस कुर्सी में क्या है जिस कुर्सी के चक्कर में लोग पहाड से मिले हुए अपने मतदाताओ का भी ध्यान नहीं रखते और अपना ध्यान रखने लग जाते हैं कहते हैं कि हम पलायन रोकेंगे और उत्तराखण्ड का सपना साकार करेंगे सच में वह सपना तो क्या साकार करते हैं लेकिन अपना जो उनका मूलभूत उद्देश्य होता है की अधिकाधिक धन अर्जन करना वह तो अवश्य पूरा हो जाता है कौन सा ऐसा नेता रहा हो उत्तराखण्ड का जिसने उत्तराखण्ड के विकास में पहाडी राज्यों में अत्याधिक विकास किया  हो राज्य बनने के बाद राज्य की अस्थाई राजधानी देहरादून और स्थाई राजधानी गैरसैण इन २१ सालों में यही निश्चित नहीं हो पाया है कि उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी कब बनी भारत के किसी भी राज्य की अस्थाई राजधानी इतने लम्बे समय तक चली हो तो आप पता करिए हमारे उत्तराखण्ड में स्थाई राजधानी को ही स्थाई माना जाता है जब गैरसैण में राजधानी स्थापित होगी तो अधिकारी वर्ग और नेता बस समझ जाएंगे पहाड में जीवन यापन कितना कठिन होता है उनको तो बस देहरादून हल्द्वानी नैनीताल उधम सिंह नगर और हरिद्वार ही पसंद होते हैं इस कारण वह क्यों पहाडी राज्यों का विकास करेंगे और पहाडी जिलों में निवास करेंगे अगर वह लोग पहाडी जिल में निवास करते तो आज उत्तराखण्ड की ऐसी स्थिति नहीं  होती जब उत्तराखण्ड के अधिकारी और नेता लोगों के बच्चे पहाडी जिलों के सरकारी विद्यालयों में अध्ययन करते या सरकारी राजकीय प्राथमिक माध्यमिक विद्यालयों में अध्ययन करते तो उन स्कूलों का विकास करते। 



उनको तो जरुरत ही नहीं  है तो वह क्यों करेंगे इन राज्यों के स्कूलों के विकास की परिचर्चा , उनको तो सिर्फ अपना फाइदा देखना होता है। सभी लोग पढे लिखे नहीं होते हैं यह भी सभी जानते हैं पर यह भी तो जानते ही हैं कि अपने अपने हिसाब से सभी को  रोजगार तो मिलना ही चाहिये । अगर सभी लोग अफसर ही बन जायेंगे तो कृषि कार्य करेगा कौन ? और कैसे होगी सभी की उदर की पूर्ति  ? तो इस काम के लिये आवश्यकता समय तथा समय के हिसाब से रोजगार के अवसर उपलब्ध करना होता है जैसे बागवानी करना फ़ल सब्जी का कार्य करना 


कृषि क्षेत्र का विकास अपने अपने तरीके से किया जाता तो क्यों होते उत्तराखण्ड के लोग पहाडो से पलायन को विवश ? आंकडे बताते हैं कि जब से उत्तराखण्ड राज्य बना है तभी से पलायन ज्यादा हुआ है , तो इसमें जिम्मेदार कौन है ? तू क्या इसीलिए बना था पृथक राज्य उत्तराखण्ड ? अगर उत्तराखण्ड के निवासियों को अपने घर में ही रोजगार के मूल भूत अवसर दिये जाते तो क्यों वहां के लोग पलायन को विवश होते अभी भी समय है पहाडी जिलों का विकास किया जाय और वहां की शैक्षणिक गतिविधि को सुधारा जाय क्यों कि आज भी मूल भूत आवश्यकता यही है कि अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान की जाय । 

सन्तोष कुमार काण्डपाल 

Monday, 7 June 2021

पलायन को लेकर यह है उत्तराखंड की स्पष्ट रिपोर्ट



पलायन शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है जब कोई व्यक्ति अच्छे रोजगार अच्छे स्वास्थ्य अच्छी शिक्षा के लिए एक जगह से दूसरी जगह पर जाए तो उसे पलायन  कहते हैं। . 

आज हम उत्तराखंड पलायन के ऊपर बात करने वाले हैं क्योंकि अब उत्तराखंड का पलायन केवल राजनीतिक मुद्दा मात्र नहीं रह गया है यह अब एक लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ भी बन चुका है क्योंकि धीरे-धीरे पहाड़ों की जो संस्कृति है वह भी अब धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर है।

एक नए उत्तराखंड बनाने का जो सपना था वह सपना इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द था कि कैसे हम जो उत्तर प्रदेश की विकास योजनाएं हैं उन्हें पहाड़ों के दूरदर्शी गांव में भेज सकें ताकि यहां के लोगों को अपने रोजगार के लिए बाढ़ शहरों की तरफ ना जाना पड़े। लेकिन आज हकीकत आप सब लोगों के सामने है।

उत्तराखंड में पलायन की समस्या दिनों-दिन विकराल रूप धारण कर रही है, जिससे साल दर साल गांव के गांव वीरान हो रहे हैं। पिछले दस साल से हर दिन औसतन 33 लोग गांवों से जा रहे हैं। यह खुलासा खुद राज्य सरकार की रिपोर्ट में हुआ है



1-उत्तराखंड पलायन आंकड़ों की दृष्टि से

वर्ष 2011 से राज्य से बाहर प्रवास करने वाले कुल 5,02,707 लोगों में से, टिहरी जिले से सबसे अधिक 89,830 लोगों के साथ पलायन हुआ, इसके बाद पौड़ी (73072), 69818 अल्मोड़ा जिले, चमोली (46290), पिथौरागढ़ (41669), रुद्रप्रयाग से आए। 30570), बागेश्वर (29300), देहरादून (28,583), चंपावत (28218), नैनीताल (25774), उत्तरकाशी (22620), हरिद्वार में कुल 9312 लोग और ऊधम सिंह नगर (7016)।

SRDMC द्वारा पिछले साल मई में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, उनमें से लगभग 50% आजीविका की तलाश में चले गए थे। उत्तराखंड में करीब 16,500 गांव हैं, जिनमें से 734 'भूत गांव' बन गए हैं।

2 पलायन रोकने में नाकाम सरकार-

हमारी सरकार पलायन रोकने में हर मुद्दे पर विफल साबित हुई है उत्तराखंड राज्य में विकास को केवल कुछ शहरों तक सीमित कर दिया गया है उत्तराखंड में अभी तक जितनी भी सरकारें आई हैं उन्होंने गांव की तरफ रोजगार को बढ़ाने के लिए ध्यान नहीं दिया है।

प्रदेश में सत्तासीन सरकारें पहाड़ में सड़क, चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार आदि मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाई हैं। पलायन रोकने के लिए गठित पलायन आयोग की संस्तुतियां फाइलों तक सीमित हैं। पर्वतीय क्षेत्र  में मूलभूत सुविधाएं और रोजगार के साधन उपलब्ध कराने, लोगों को जल जंगल, जमीन संबंधी अधिकार देने के साथ ही हिमाचल प्रदेश के विकास के मॉडल को आदर्श मानते हुए उसे अपनाना चाहिए!


3-पलायन रोकने में संगठनों की भूमिका


हम केवल लोगों को यह नहीं कह सकते कि आप वापस उत्तराखंड आइए पहले हमें उन्हें रोजगार के कुछ साधन मुहैया कराने पड़ेंगे हमें हमारी जो कुछ योजनाएं हैं उनके बारे में उन्हें अवगत कराना पड़ेगा उन्हीं में से कुछ योजनाएं निम्नलिखित हैं-


(a) होम स्टे योजना 


क्योंकि उत्तराखंड  पर्यटन राज्य है इस कारण हमारे युवाओं को इस योजना के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी होनी चाहिए-


पलायन रोकने और स्वरोजगार व पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से होम स्टे योजना संचालित की गई है। पर्यटन विभाग की ओर से दीनदयाल उपाध्याय योजना के तहत पर्वतीय क्षेत्रों में 33 प्रतिशत और मैदानी क्षेत्रों में 25 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है। जोशीमठ के सुनील गांव निवासी नितिन सेमवाल पिछले दो सालों से होम स्टे का संचालन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि एक वर्ष में होम स्टे से करीब पचास हजार तक कमा लेते हैं।


(b) मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना-

इस कार्यक्रम के तहत आवेदन करने वाले प्रवासियों को संबंधित अधिकारियों से त्वरित स्वीकृति मिल जाएगी और उनके आवेदन तत्काल सब्सिडी के साथ बैंकों को अग्रेषित किए जाएंगे जो पहाड़ी जिलों में 25% और मैदानी जिलों में 15% होगी।इस परियोजना का उद्देश्य युवाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान करना और रिवर्स माइग्रेशन को बढ़ावा देना है


अभिषेक पाण्डेय

गढकुमाऊँ संगठन कार्यकर्ता                                                                             

                                                                                    

उत्तराखण्ड में भू कानून की आड़ में क्या चल रहा है खेल

बिना दाँत के व्यक्ति को अगर गन्ना चूसने के लिए दे दिया जाए तो उसकी हालत शायद वैसी ही होगी जैसे कमजोर भू-क़ानून के साथ किसी राज्य की होती है,...